उत्‍तर प्रदेश में फिर दौड़ेगा हाथी

दिल्ली (ब्यूरो)। अमर उजाला-इंडिया टीवी सी-वोटर सर्वेक्षण के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में एक बार फिर बसपा की सरकार बनने जा रही है। कम से कम उसे सबसे ज्यादा सीटें मिलने की संभावना है। भाजपा या रालोद या निर्दलों की मदद से वह सरकार बनाने की स्थिति में है। सर्वे के नतीजे बताते हैं कि यूपी में 143 सीटों के साथ बहुजन समाज पार्टी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरेगी।

सपा को 137, भाजपा को 48 और कांग्रेस को 40 सीटें मिलने का अनुमान है। सर्वे से पता चला है कि परंपरागत वोटर मायवती के रुतबे का कायल है और प्रतिमा को ढंकने के आदेश का फायदा बसपा को होता दिख रहा है। सर्वे के मुताबिक पंजाब और उत्तराखंड में कांग्रेस की सरकार बन सकती है। अगर मौजूदा हालात कायम रहते हैं तो भाजपा को उत्तरप्रदेश में काफी नुकसान उठाना पड़ सकता है। अलबत्ता उत्तराखंड में अंतिम समय में मुख्यमंत्री बदलने की कवायद ने उसे थोड़ा संभाला है, बावजूद इसके समस्याएं कम नहीं हुई हैं।

उत्तर प्रदेश में मायावती की बसपा अभी भी अकेली सबसे बड़ी पार्टी के रूप में दिखाई दे रही है। सी-वोटर इंडिया टीवी सर्वे के मुताबिक समाजवादी पार्टी और क्रांगेस ने पिछली बार के मुकाबले उल्लेखनीय सुधार किया है। जहां तक अन्ना फैक्टर का सवाल है- लोगों का मानना है कि टीम अन्ना यदि पार्टी की बजाय उम्मीदवारों के आधार पर आह्वान करे तो बात बन सकती है। वे अन्ना के भ्रष्टाचार विरोधी मुद्दे से तो सहमत हैं लेकिन वोट देने में उन्हें प्रत्याशियों की सूरत और स्थानीय समीकरण ज्यादा प्रभावित करते हैं।

यह पहले दौर की रायशुमारी है लेकिन जिस तरह से हालात बदल रहे हैं, उससे दो हफ्ते के भीतर ही आंकड़ों में आश्चर्यजनक उतार-चढ़ाव आने की संभावना है। सर्वे के नतीजे बताते हैं कि यूपी में 143 सीटों के साथ बहुजन समाज पार्टी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरेगी। सपा को 137, भाजपा को 48 और कांग्रेस को 40 सीटें मिलने का अनुमान है। 4 जनवरी तक किए गए सर्वे में कांग्रेस को फायदा होता दिख रहा है। भाजपा को सबसे ज्यादा नुकसान में दिख रहा है।

भाजपा की लोकप्रियता घट रही है। सर्वे नतीजों का विश्लेषण कहता है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा किंगमेकर की भूमिका में भी नहीं रहने वाली है और चूंकि भाजपा सत्ता से दूर नजर आ रही है इसलिए मुसलिमों को भी रणनीतिक वोटिंग की जरूरत नहीं होगी। खासतौर से आजम खां की वापसी केसाथ मुसलिम मतदाता सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह से फिर जुड़ते दिख रहे हैं।

सपा-कांग्रेस गठबंधन मुसलिमों को बेहतर विकल्प नजर आ रहा है। माया सरकार के प्रति लोगों की प्रतिक्रिया मिलीजुली है। बसपा का परंपरागत वोट बैंक तो जस का तस है लेकिन शहरी मध्यवर्ग और ब्राह्मण मतदाता उससे दूर जाता दिख रहा है। लेकिन परंपरागत वोटर मायवती के रुतबे का कायल है और प्रतिमा को ढंकने के आदेश का फायदा बसपा को होता दिख रहा है। बसपा इसके लिए कांग्रेस को दोषी ठहराकर दलित मतों का ध्रुवीकरण करने की कवायद कर रही है।

अगर कांग्रेस किंगमेकर की भूमिका में आती दिख रही है तो ये उसकेलिए बड़ी उपलब्धि है। दिलचस्प तथ्य यह है कि सिर्फ भ्रष्टाचार वोट खींचने वाला मुद्दा नहीं रहा। लोग सबसे तंग आ चुके हैं और सबको बराबर भ्रष्ट मानते हैं। लगभग सभी सीटों पर चतुष्कोणीय या पंचकोणीय मुकाबला होने के आसार हैं। उत्तराखंड राज्य में भी एंटी इनकंबेंसी फैक्टर दिखाई देता है लेकिन खंडूरी को वापस लाना भाजपा को फायदा पहुंचा रहा है।

अंदरूनी गुटबाजी कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए नुकसानदेह हैं। इस चुनाव में भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी, जनप्रतिनिधियों द्वारा काम न करवाना आदि महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। पिछले चुनावों में तीसरे स्थान पर रही बहुजन समाज पार्टी मैदानी इलाकों में बसपा का जनाधार काफी मजबूत करती दिख रही है। सर्वे के मुताबिक पंजाब में कांग्रेस को 117 औऱ अकाली भाजपा गठबंधन को 46 सीटें मिलेंगी। उत्तराखंड में कांग्रेस को 34 भाजपा को 18 सीटें मिल सकती हैं। लेकिन हैरतअंगेज रूप से बसपा 12 सीटों पर आगे दिख रही है।

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