उत्तर प्रदेश में मायावती ने बनाया अनूठा रिकार्ड

Uttar Pradesh Chief Minister Mayawati
मुजफ्फरनगर। उत्तर प्रदेश के उस अनूठे रिकार्ड को प्रदेश की मुख्यमंत्री एवं बसपा सुप्रीमों मायावती ने वर्ष 2007 में विधानसभा का चुनाव जीतकर पूर्ण बहुमत से सरकार बना उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री की कुर्सी पर पूरे पांच विराजमान होकर उत्तर प्रदेश के उस रिकार्ड को तोड दिया जो उत्तर प्रदेष में मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर आजादी के बाद से आज तक का बना हुआ था कि उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आज तक एक व्यक्ति ने पूरे पांच साल तक विराजमान होकर सरकार नहीं चलायी यदि किसी ने 6 माह के लिए सरकार बनायी तो किसी ने गठबंधन कर दो साल के लिए सरकार बनायी।

जहां उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती प्रदेश में नई तहसील बनाने के साथ साथ प्रदेष में नये जनपद बनाने का भी रिकार्ड बना चुकी है वहीं उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री की कुर्सी पर पूरे पांच साल विराजमान होकर उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री के इस रिकार्ड को भी तोड दिया जिसमें आजादी के बाद से आज तक का रिकार्ड बना था कि किसी ने भी उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री के पद पर पूरे पांच साल राज नहीं किया है जिसका सिरे भी मुख्यमंत्री मायावती को ही जाता है।

अलबत्ता यह बात एक अलग है कि उत्तर प्रदेश की 11वीं विधानसभा में भारतीय जनता पार्टी के उपाध्यक्ष रहे कल्याण सिंह एक ऐसे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे थे जिन्होंने पूरे विधानसभा कार्यकाल के दौरान में उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान रहे है भले ही वह कार्यकाल पांच साल का न होकर मात्र 2 साल में ही खत्म हो गया हो।

गौरतलब है कि भारत में आजादी के बाद जब उत्तर प्रदेश का पहला विधानसभा चुनाव वर्ष 1952 से अब तक पिछले 60 वर्षों में अब तक 14 बार विधानसभा चुनाव हो चुके है और इस दौरान उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर चन्द्रभानु और नारायण दत्त तिवारी चार-चार बार, सपा सुप्रीमों मुलायम सिंह यादव और मायावती तीन-तीन बार तथा स्वर्गीय सम्पूर्णानंद, चौधरी चरण सिंह, हेमवती नंदन बहुगुणा तथा कल्याण सिंह दो-दो बार तथा गोविन्द वलम्भ पन्त, सुचेता कृपानी, टीएन सिंह, कमलापति त्रिपाठी, रामनरेश यादव, बनारसी दास, विश्वनाथ प्रताप सिंह, श्रीपति मिश्र, वीर बहादुर सिंह, रामप्रकाश गुप्ता और राजनाथ सिंह ने एक-एक बार राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण की लेकिन आज तक किसी ने भी पूरे पांच साल तक उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री के पद का पूरा कार्यकाल नहीं किया लेकिन बसपा सुप्रीमों सुश्री मायावती ने वर्ष 2007 में विधानसभा चुनाव जीतकर पूर्ण बहुमत से अपनी सरकार बना उत्तर प्रदेश में पांच वर्षों तक का अपना पूर्ण कार्यकाल सम्पन्न करने वाली है।

यदि उत्तर प्रदेश के विधानसभा सत्रों का पूर्व का आजादी के बाद से वर्ष 1952 से रिकार्ड देखा जाये तो सर्वप्रथम 20 मई 1952 को उत्तर प्रदेश राज्य के पहले मुख्यमंत्री के रूप में पंडित गोविन्द वल्लभ पंत ने शपथ ग्रहण कर उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री की कुर्सी ग्रहण की। लेकिन वर्ष 1954 में उनके केन्द्रीय राजनीति में चले जाने के बाद सम्पूर्णानन्द ने उत्तर प्रदेश के दूसरे मुख्यमंत्री के रूप में शपथग्रहण कर उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री की कुर्सी ग्रहण की। इसके 5 वर्ष बाद वर्ष 1957 में हुए दूसरी बार हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस फिर सत्ता में आयी और सम्पूर्णानंद ने 1957 को दोबारा मुख्यमंत्री की कुर्सी सम्भाली लेकिन कांग्रेस की ओर से नेतृत्व परिवर्तन किए जाने पर राज्य के लौह पुरूष के नाम से मशहूर स्वर्गीय चन्द्रभानु गुप्त ने राज्य की कमान दूसरी विधानसभा के कार्याकाल के दौरान में ही स्वर्गीय सम्पूर्णानंद के बाद सात दिसम्बर 1960 को राज्य के तीसरे मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण कर थामी।

वर्ष 1962 में कांग्रेस ने राज्य विधानसभा का चुनाव श्री गुप्त की अगुवाई में लडा और 14 मार्च 1962 को तीसरी बार फिर उत्तर प्रदेश की सत्ता कांग्रेस के हाथ में आयी जिसमें श्री गुप्त दूसरी बार फिर प्रदेश के मुख्यमंत्री के पद पर विराजमान हुए। लेकिन एक अक्टूबर 1963 को चन्द्रभानु गुप्त की अपना इस्तीफा दिये जाने के बाद सुचेता कृपलानी के हाथों में उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री के रूप में कमान दी गयी तथा वर्ष 1967 में चौथीं विधानसभा के चुनाव के बाद 14 मार्च 1967 को श्री गुप्त के नेतृत्व में कांग्रेस ने फिर अपनी सरकार बनायी और लेकिन 1967 को किसानों के मसीहा चौधरी चरण सिंह के कांग्रेस से अलग हो जाने के बार कांग्रेस की सरकार गिर गयी और 1967 को किसानों के मसीहा चौधरी चरण सिंह ने पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री की शपथ ग्रहण कर उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली। लेकिन 25 फरवरी 1868 को चौधरी चरण सिंह की सरकार हटा दी गई और उत्तर प्रदेश राज्य में पहली बार राष्ट्रपति शासन लागू किया गया जो करीब एक वर्ष तक रहा।

इसके बाद 18 फरवरी 1969 को पांचवीं विधानसभा का चुनाव उत्तर प्रदेश में हुआ जिसमें 26 फरवरी 1969 से सत्राह फरवरी 1969 तक के लिए एक बार फिर चन्द्रभानु गुप्त ने चौथी और आखिरी बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण कर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। कांग्रेस का विभाजन होने के पश्चात श्री गुप्त के स्थान पर 18 फरवरी 1970 को चौधरी चरण सिंह की अगुवाई में भारतीय क्रांति दल की सरकार सत्ता में आयी और चौधरी चरण सिंह दूसरी बार राज्य के मुख्यमंत्री बने लेकिन इस बार भी सरकार मात्र आठ माह ही चल पायी और एक अक्टूबर 1970 को सरकार को हटाकर राज्य में दूसरी बार राष्ट्रपति शासन लागू किया गया। इसके बाद 18 अक्टूबर 1970 को त्रिभुजन नारायण सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार सत्ता में आयी लेकिन यह सरकार भी मात्र 6 माह की निर्धारित अवधि में उनके विधानमंडल के किसी भी सदन का सदस्य नहीं बन पाने के कारण तीन अपै्रल 1971 को श्री त्रिभुजन नारायण सिंह को भी मंत्री पद से हटा दिया गया और 1971 को पंडित कमलापति त्रिपाठी पहली बार प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। लेकिन त्रिपाठी भी 4 अपै्रल 1971 से 12 जून 1973 तक राज्य के मुख्यमंत्री के पद पर विराजमान रहे और राज्य में हुए पीएसी विद्रोह तथा छात्र आंदोलन के कारण राज्य में एक बार फिर राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया।

इसके बाद 8 नवम्बर 1973 को हेमवती नंदन बहुगुणा के नेतृत्व में राज्य में फिर से कांग्रेस की सरकार बनी। लेकिन वर्ष 1974 में हुए छठीं विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस को मिली सफलता के बाद मार्च 1974 से 29 नवम्बर 1975 तक श्री बहुगुणा दोबारा प्रदेश की मुख्यमंत्री रहे। लेकिन आपातकाल के दौरान 29 नवम्बर 1975 को उत्तर प्रदेश में एक बार फिर राष्ट्रपति शासन लागू किया गया। इसके बाद नारायण दत्त तिवारी 21 जनवरी 1976 से केन्द्र की जनता पार्टी सरकार की ओर से कांग्रेस शासित सभी राज्य सरकारों को 30 अप्रैल 1977 को बर्खास्त किए जाने तक मुख्यमंत्री रहे। बाद में वर्ष 1977 में जनता पार्टी लहर के दौरान हुए चुनाव के बाद रामनरेश यादव 23 जून 1977 से 27 फरवरी 1979 तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। वर्ष 1979 में जनता पार्टी में विभाजन के बाद बनारसी दास के नेतृत्व में सरकार बनी लेकिन 1980 में यह सरकार बर्खास्त कर दी गई और विधानसभा चुनाव हुए। चुनाव में कांग्रेस ने विजय प्राप्त की और 9 जून 1980 को विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रदेश के मुख्यमंत्री बने लेकिन उन्होंने भी 18 जून 1982 को इस्तीफा दे दिया और पंडित श्रीपति मिश्रा 19 जुलाई 1982 को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान हुए।

वर्ष 1985 में हुए विधानसभा चुनाव से पूर्व कांग्रेस की ओर से नेतृत्व परिवर्तन किये जाने के नतीजतनर श्री नारायण दत्त तिवारी तीन अगस्त 1984 से 10 मार्च 1985 तक दूसरी बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। इस बीच कांग्रेस ने उनकी अगुवाई में वर्ष 1985 में राज्य विधानसभा चुनाव सफलतापूर्वक लडा और वह 11 मार्च 1985 को तीसरी बार प्रदेश के मुख्यमंत्री बने लेकिन उनका यह कार्यकाल मात्र छह माह का ही रहा और छह माह बाद ही उन्हें हटाकर उनके स्थान पर वीर बहादुर सिंह को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बना दिया गया। श्री सिंह के केन्द्रीय राजनीति में चले आने के बाद 25 जून 1988 को स्वर्गीय वीर बहादुर सिंह के निधन के बाद श्री नारायण दत्त तिवारी चौथी बार प्रदेश के मुख्यमंत्री नियुक्त किये गये जिसके बाद कांग्रेस ने उनकी अगुवाई में 10वीं बार उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव लडा लेकिन इस बार कांग्रेस को हार का मुंह देखना पडा और राज्य में पांच दिसम्बर 1989 को श्री मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में जनता दल की सरकार बनी। वर्ष 1991 में उनकी सरकार भी गिर गयी और राज्य में फिर से विधानसभा चुनाव हुए और इस दौरान चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिला और राज्य में पहली बार श्री कल्याण सिंह की अगुवाई में 24 जून 1991 को उनकी सरकार बनी। उनकी सरकार को 6 दिसम्बर 1992 को अयोध्या में विवादित ढांचा गिराये जाने के बाद बर्खास्त कर दी गई और राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया।

इसके बाद वर्ष 1993 में हुए विधानसभा चुनाव में सपा-बसपा गठबंधन की मुलायम सिंह की सरकार 5 दिसम्बर 1993 को सत्ता में आई। गठबंधन टूट जाने पर तीन जून 1995 को श्री यादव का दूसरी बार राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में कार्यकाल खत्म हो गया और सुश्री मायावती के नेतृत्व में उसी दिन भाजपा के समर्थन में बसपा की सरकार बनी लेकिन यह सरकार भी करीब पांच माह बाद 18 अक्टूबर को गिर गई और राज्य में एक बार फिर राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया। करीब एक वर्ष तक राष्ट्रपति शासन के बाद वर्ष 1997 में हुए चुनाव में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला और बसपा तथा भाजपा के बीच 6-6 माह अपना अपना मुख्यमंत्री बनाने के समझौते के आधर पर मायावती 21 मार्च 1997 को मुख्यमंत्री बनीं और छह माह बाद की अवधि समाप्त होने पर 21 सितम्बर 1997 को कल्याण सिंह ने सत्ता संभाली लेकिन बसपा की ओर से समर्थन वापस लेने से सरकार संकट में आ गई। कांग्रेस से अलग हुए 22 सदस्यीय उत्तर प्रदेश लोकतांत्रिक कांग्रेस, बसपा से टूटे 12 विधायकों, तीन सदस्यीय जनता दल राजाराम पाण्डेय गुट, समता

पार्टी और निर्दलीय विधायकों समेत 222 विधायकों के समर्थन से कल्याण सिंह ने 12 नवम्बर 1999 तक प्रदेश में अपनी सरकार चलायी। नेतृत्व परिवर्तन किये जाने के साथ 12 नवम्बर 1999 को ही भाजपा नीत रामप्रकाश गुप्त सरकार सत्ता मं आयी जो 28 अक्टूबर 2000 तक चली। भाजपा की ओर से एक बार फिर किए गए नेतृत्व परिवर्तन के साथ उसी दिन राजनाथ सिंह की अगुवाई में गठबंधन की सरकार सत्ता में आयी। वर्ष 2002 में हुए विधानसभा चुनाव मे एक बार फिर किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत हासिल नहीं हुआ और काफी प्रयासों के बाद जब कोई सरकार नहीं बन सकी तो आठ मार्च 2002 में राज्य में एक बार फिर राष्ट्रपति शासन लागू हो गया जो तीन मई 2002 तक लागू रहा। भाजपा के सहयोग से राज्य में बसपा नीत गठबंधन की सरकार तीन मई 2002 को सत्ता में आयी और मायावती तीसरी बार राज्य की मुख्यमंत्री बनी। बसपा मुखिया की ओर से सितम्बर 2003 में इस्तीफा दे देने के बाद 28 सितम्बर 2003 को सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में राष्ट्रीय लोकदल, कांग्रेस तथा अन्य कई छोटी-छोटी पार्टियों की मिलजुली सरकार सत्ता में आयी और श्री यादव तीसरी बार राज्य के मुख्यमंत्री बने। बाद में वर्ष 2007 को हुए विधानसभा चुनाव में बसपा पूर्ण बहुमत से विजय हासिल करने के बाद बसपा सुप्रीमों ने सत्ता में आयी और वर्ष 2007 को प्रदेश की वर्तमान मुख्यमंत्री एवं बसपा सुप्रीमों ने शपथग्रहण कर उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री की कुर्सी ग्रहण कर पहली बार पूरे पांच साल का कार्यकाल पूरा करते हुए उत्तर प्रदेष में जो रिकार्ड बना हुआ था कि उत्तर प्रदेष में किसी भी मुख्यमंत्री ने पूरे पांच साल सरकारी नहीं चलायी है उसे मायावती ने तोड दिया है।

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