भाईयों से होगी बादल की आखिरी लड़ाई

Prakash Singh Badal
चंडीगढ़। केंद्र तथा पंजाब में सत्ता गलियारों में देखने वाले पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल अपने राजनीतिक जीवन में दर्जनों चुनाव लडऩे के बसद भी 84 वर्ष की आयु में लंबी विधानसभा क्षेत्र से अंतिम चुनावी पारी खेलने के लिए चुनावी मैदान में हैं। इस बार उन्हें अपने सगे भाई गुरदास बादल तथा चचेरे भाई महेश इंद्र सिंह बादल से चुनावी सामना करना पड़ रहा है, जोकि देश-प्रदेश की नजरों का केंद्र बना चुका है।

केंद्रीय कृषि मंत्री तथा चार बार पंजाब के मुख्यमंत्री रहे प्रकाश सिंह बादल की यह विशेषता है कि वह राजनीतिक संकट से बखूबी निपटने में माहिर है और ऐसी स्थिति मौजूदा चुनाव में बनी हुई है। स.बादल अपने राजनीतिक जीवन की क्रीज पर ''नॉट आऊट" है, क्योंकि अपनी इस लंबी आयु में जितना संघर्ष राजनीति में किया है,उससे कहीं ज्यादा जेलों में रहे है। राजनीति में स.बादल ने अपना वारिस सुखबीर बादल उपमुख्यमंत्री पंजाब को बनाकर इस अंतिम उपचुनाव उपरांत राजनीति से संयास लेने का मन बनाया है और क्षेत्र के मतदाताओं से यहीं उम्मीद बादल कर रहे है कि वह उन्हें इस बार भी 'आऊट' न करें।

परिवारवाद के आरोपों में सदैव घिरे रहे बादल मौजूदा चुनाव में, जहां बाहरी चुनौती का सामना कर रहे है, वहीं अपनो द्वारा दी गई चुनौती से जुझ रहे है। सिख राजनीति में विशेष पहान बनाने वाले स.बादल को उनके विरूद्ध बगावती तेवरों ने कभी दिक्कतें नहीं आने दी, मगर वर्तमान स्थिति का रूख बदला-बदला नजर आ रहा हे। अपने राजनीतिक जीवन की अंतिम राजनीतिक चुनावी पारी में स.बादल के लिए सगा भाई गुरदास बादल व भतीजा मनप्रीत बादल सबसे बड़ी चुनौती बने हुए है। पिछले दो विधानसभाई चुनावों में अपने चचेरे भाई महेश इंद्र सिंह बादल को पराजित करने वाले स.बादल का मौजूदा राजनीतिक स्थिति से जुझना कम नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वह संवदेनशील तथा ज्वलनशील माहौल में भी टक्कर दिए हुए है।

आपातकाल, आतंकवाद और परिवारिक विघटन से न टूटने वाले स.बादल इस बार स्वयं को घिरा हुआ मान रहे है, क्योंकि अपने राजनीतिक जीवन में कभी भी उन्हें किसी भी चुनाव में इतनी बड़ी चुनौती नहीं मिली। पंजाब के राजनीतिक इतिहास में पहली बार अपनी छ: दशकीय राजनीतिक पार्टी स.बादल, जितने विरोधाभासों से गुजरें, उतने विरोधाभास शायद किसी अन्य समकालीन राजनेता को हीं भोगने पड़े।

स.बादल ने अपनी उदारवादी छवि के चलते कई बार अनिच्छापूर्वक या समाजिक जरूरतों को मध्य नजर रखते हुए ''ना पसंद" की भी पीठ थपथपा कर कुशल राजनीतिज्ञ का प्रमाण दिया है। वर्तमान में स.बादल का राजनीतिक जीवन दाव पर लगा है और उसे अपनी राजनीतिक विरासत की सुरक्षा के लिए अंतिम पारी के रूप में चुनावी संघर्ष से जूझना पड़ रहा है, क्योंकि अब उनके अपने अपने नहीं रहे, बल्कि बेगानों को भी पीछे छोड़ रहे है।

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