सपा के चुनाव प्रचार से गुम हुए सितारे

लखनऊ। प्रदेश में चुनाव नजदीक है। युवाओं की अगुवाई करते हुए सपा प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव रथ लेकर निकल पड़े हैं लेकिन कार्यकर्ताओं में उत्साह नहीं ला पा रहे हैं। हमेशा से फिल्मी सितारों की चकाचौंध से घिरी रहने वाली सपा इस चुनाव में सन्नाटे में है। कार्यकर्ताओं में उत्साह भरने के लिए पार्टी के पास न पहले की तरह सितारों का न जमावड़ा है और न ही बेबाक अंदाज में विरोधियों को परास्त करने वाला अन्दाज। प्रदेश में चुनाव जंग जीतने की कवायद में जुटी सपा ने सबसे पहले प्रत्याशी घोषित करने के साथ ही अन्य दलों को पछाड़ते हुए चुनाव प्रचार भी शुरू कर दिया। सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने इस बार प्रचार की कमान सपा के युवराज अखिलेश यादव को सौंपी है।

अखिलेश आधुनिक सुविधाओं से युक्त रथ पर सवार होकर प्रचार के लिए निकल पड़े। प्रदेश के विभिन्न जिलों में उनकी सभाओं का दौर जारी है लेकिन भीड़ नदारद है। रूपहले पर्दे के सितारों के सपा से दूर होते ही भीड़ खुद व खुद छट गयी। पार्टी कार्यकर्ताओं का उत्साह भी ठंडा पड़ता जा रहा है। कल तक जिस पार्टी में फिल्मी सितारों का जमावड़ा लगा रहता था। वह पार्टी के प्रचार का मुख्य माध्यम होते थे। अमर सिंह के जाने से यह रौनक भी चली गयी। भोजपुरी सम्राट मनोज तिवारी, फिल्म अभिनेता संजय दत्त और यहां तक की जयप्रदा व जया बच्चन भी अब सपा से दूर हैं।

ऐसे में पार्टी के सामने संकट यह है वह आखिर जनता को रिझाने के लिए चेहरा कहां से लायें। सपा के पास प्रचार के लिए नेताओं की भी कमी है। विरोधियों को अपनी तीखी जुबान से नेस्तानाबूद करने वाले अमर सिंह की भी आस्था सपा से खत्म हो चुकी है। आजम खां की घर वापसी जरूर हो गयी है लेकिन पार्टी के भीतर ही लोग उनको स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं। ऐसे में सपा के पास पिता-पुत्र के अलावा अन्य कोई स्टार प्रचारक नहीं है।

वहीं टिकट बंटवारे से असंतुष्टों की फौज भी बढ़ गयी है। कई दफे बैठकें कर सपा मुखिया मुलायम सिंह ने इस बाबत कार्यकर्ताओं को समझाया भी लेकिन बात बनती नजर नहीं आयी। प्रदेश में कभी सशक्त भूमिका में रही सपा की यह स्थिति एकाएक नहीं बिगड़ी। इसके पीछे कई कारण रहे हैं जिन्होंने पार्टी की जड़ों को हिलाकर रख दिया। विधानसभा चुनाव के बाद जितने उपचुनाव हुए सपा गर्त में गिरती चली गयी।

यहां तक कि पहली बार पार्टी प्रमुख की बहू ने घर से बाहर कदम निकाला लेकिन उनका यह कदम भी पार्टी की लाज को नहीं बचा सका। लोकसभा चुनाव में आपसी खींचतान व मुस्लिम मतदाताओं की नाराजगी के चलते सपा को खासा नुकसान हुआ। लाख कोशिशों के बाद भी सपा अपनों द्वारा ही लगाये गये परिवारवाद के आरोपों से बरी नहीं हो सकी और पार्टी के उच्च पदाधिकारियों के आपसी मतभेद बढ़ते गये।

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