कुशवाहा के कारण डैमेज को कंट्रोल करने में जुटी भाजपा

गौरतलब है कि बसपा के पूर्व मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा के पार्टी में शामिल होने के बाद आडवाणी गुस्से में हैं। पार्टी ने पहले सोचा था कि वह बसपा के कीचड़ में अपना कमल खिला लेगी मगर अब उसके अपने ही घर में आग लग गई है। इतना ही नहीं पार्टी फिलहाल दो खेमों में भी बट चुकी है। एक तरफ आडवाणी, सुषमा स्वराज और अरुण जेटली जैसे वरिष्ठ नेताओं की फौज है जो कुशवाहा के आने से नाखुश है, वहीं दूसरी ओर विनय कटियार और नितिन गडकरी व उनके सहयोगी हैं जो कुशवाहा को फूल मालायें पहना कर घुमा रहे हैं। यही नहीं 2010 में बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा के कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाली जनता दल यूनाइटेड ने भी यूपी में भाजपा का साथ छोड़ दिया है। राजनीतिक सुगबुगाहट है कि कुशवाहा को पार्टी में शामिल करने के बाद भाजपा को अब जबरदस्त नुकसान का डर सताने लगा है। सूत्रों का कहना है कि भाजपा का अगर यही रवैया रहा तो वह चुनाव में चौथे नंबर पर चली जायेगी।
खैर परिणाम कुछ भी हो मगर भाजपा की साख को करारा झटका लगा है। इतना ही नहीं पार्टी के कार्यकर्ताओं में भी जबरदस्त रोष है। खास बात तो यह है कि जैसे ही कुशवाहा के समर्थकों ने नुकसान भरपाई की बात की तो भाजपा ने और दागी नेताओं को मैदान में उतार दिया। अब ऐसे में भाजपा पर कई सवाल उठने लगे हैं। विपक्ष बखिया उधेड़ने में जुट गई है। पार्टी सभी सवालों पर सफाई भी दे रही है मगर क्या इस सफाई से बीजेपी की कथनी करनी में फर्क पर उठे सवाल बंद होंगे? यहां सवाल सिर्फ सियासी हमलों या आरोपों प्रत्यारोपों का नहीं है, सवाल ये भी है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ देश में रथयात्रा निकालने वाली बीजेपी क्या चुनाव आते ही ऐसे रंग बदल लेगी?












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