भूखे के पेट को सहलायेगा या लात मारेगा खाद्य सुरक्षा बिल

प्रदीप कुमार शुक्‍ल
हाल ही में केंद्र सरकार राष्‍ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक लायी। सरकार ने इसका जमकर डंका भी पीटा, जिसकी कुछ खबरें मीडिया में आयीं, लेकिन आम आदमी अभी भी इससे खुद को जुड़ा महसूस नहीं कर पा रहा है। असल में विधेयक की संरचना ही कुछ ऐसी है कि आम आदमी इसे अपने सरोकारों से अलग समझता है।

विधेयक को देखकर लगता है कि यह बहुत जटिल है। यह लागू हो पायेगी की नहीं यह कहा नहीं जा सकता है। यह भी अभी नहीं कहा जा सकता कि सरकार ने इसे पेश कर सिर्फ खानापूर्ति की है या वाकई में वो गंभीर है। खैर यह तो तय है कि इस बिल के पीछे चतुर बुद्धि वाले लोग हैं। यही नहीं उनके नेक इरादे पर पानी फेरने वाल लोग भी देश है मौजूद हैं।

आपको बताते चलें कि विधेयक की प्रस्‍तावना बहुत लंबी है उसे पढ़कर ऐसा लगता है कि भारत की सरकार अचानक अति संवेदनशील हो गयी है। और उसको अपनी जिम्‍मेदारीयों की समझ आने लगी है। 1949 के मानव अधिकारों के घोषणा पत्र से प्रस्‍तावना की शुरूआत की गयी है। जिसमे सभी को पर्याप्‍त भोजन पाने का अधिकार है। भोजन से इसका मतलब सिर्फ चावल और गेंहू नहीं। इसमें भारतीय संविधान के कई अनुच्‍छेद का उल्‍लेख भी किया गया है।

अनुच्‍छेद 21 (जिसके अंतर्गत हर व्‍यक्ति को इज्‍जत से जिने का अधिकार है), अनुच्‍छेद 39A (राज्‍य अपनी जिम्‍मेदारी को समझते हुए स्‍त्री पुरूष सभी की जीविका के पर्याप्‍त साधनों को देखते हुए चले), अनुच्‍छेद 42 (राज्‍य सभी के लिए काम करने की मानवीय स्थितियों और मातृत्‍व राहत की व्‍यवस्‍था करे) और अनुच्‍छेद 47- (सभी के पोषण और रहन सहन के स्‍तर का ऊचा उठाना एंव लोगो के स्‍वास्‍थ में सुधार लाना भी राज्‍य सरकार की जिम्‍मेदारी है) से महीने में सात किलो गेहूं या चावल देने के बड़े-बड़े लक्ष्‍यों की प्राप्ति हो जाएगी? क्‍या यही भोजन और पोषण भारत का मानवीय स्‍तर है?

खाद्य सुरक्षा विधेयक 2011 में जिन लोगों को राहत दी जाएगी उनको दो वर्गो मे बांटा गया है। प्राथमिक वर्ग और सामान्‍य वर्ग में बांटा गया है। प्राथमिक वर्ग को अनाज की मात्रा में ज्‍यादा राहत दी जाएगी और सोमान्‍य वर्ग को कम और दोनों को अनाज भी कम किमत पर दी जाएगी। इन्‍हें मापने के लिए भी विभिन्‍न प्रबंध किया गया है। जिन लोगो को प्राथमिक वर्ग में रखा जाएगा उनकी संख्‍या कुल ग्रामीण्‍ा परिवारों की 46 प्रतिशत होगी। तथा कुल ग्रामीण परिवारों में कम से कम 90 प्रतिशत को अन्‍न की राहत दी जाएगी।

वहीं शहरों में यह प्रतिशत क्रमश: 28 प्रतिशत प्राथमिक परिवारो को और कुल प्रतिशत 50 प्रशिशत होगा। यह आकड़ा की काफी है हमारे आर्थिक शक्ति की महापोल खोलने में।

इस विधेयक में और भी कुछ नई व्‍यवस्‍था की गयी है। जिसकी तारिफ करने का मन करता है। जैसे प्रत्‍येक गर्भवती और दूध पिला रही महिला को 6 महीने तक 1-1 हजार रूपये की सहायता दी जाएगी। इसके अलावा प्रत्‍येक स्‍त्री को जो गर्भवती है गर्भ के दौरान और उसके बाद 6 महिने तक आंगनवाणी से मुफ्त राशन अथवा पका पकाया भाजन ले जाने का अधिकार होगा।

दरिद्रतम व्‍यक्तियों तथा बेघरों को (जो फुटपाथ पर, रेलवे स्‍टेशन पर या और भी जगहों पर सोते हैं) कम से कम एक टाइम ताजा भोजना का दिया जाएगा। जिन क्षेत्रों को राज्‍य सरकार आपदाग्रस्‍त घोषित कर देगी। देश के सभी दरिद्रतम व्‍यक्तियों, स्‍त्रियों और बच्‍चों को दोनो टाइम मुफ्त पका पकाया भोजन दिया जाएगा।

लेकिन ऐसे देश में जहां मिड-डे मील का ठीक तरह से क्रियान्‍वयन हो नहीं पा रहा है, वहां दरिद्रों के लिए भोजन कौन और कैसे पकायेगा। कागजी तौर पर कहना जितना आसान है, लेकिन इस लागू करना उतना ही मुश्किल है। खास बात यह है कि केंद्र चाहे कुछ भी कर ले, फिर भी पूरे राज्‍य में इस कानून को लागू करना आसान नहीं होगा, क्‍योंकि तमाम राज्‍य इसका विरोध कर रहे हैं।

सरकार का यह कदम तो काफी सराहनीय है, लेकिन जो सरकार खेतों में पैदा होने वाले अनाज को संभाल कर नहीं रख पाती है, वो खाद्य सुरक्षा कैसे देगी, यह सोचने वाली बात है। हर साल लाखों कुंतल अनाज पंजाब से लेकर आंध्र प्रदेश तक मैदानों में पड़ा सड़ जाता है, हजारों कुंतल गेहूं गोदामों में पड़ा सड़ जाता है, लेकिन सरकार सुध नहीं लेती। सुप्रीम कोर्ट की फटकार तक का उस पर कोई असर नहीं पड़ता। ऐसे में वो उसी गेहूं को पिसवा कर लोगों तक रोटी पहुंचाने की योजना बना रही है।

हम यह नहीं कहते कि सरकार की यह योजना विफल हो जायेगी, लेकिन अगर सरकार को वाकई में खाद्य सुरक्षा देनी है तो लाखों टन अनाज को सड़ने से बचाना होगा, अन्‍यथा इस बिल का कोई मतलब नहीं।

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