यूपी: क्षत्रियों से बसपा का मोह भंग

कैबिनेट मंत्री बादशाह सिंह से लेकर धनंजय सिंह तक यह सिलसिला लगातार चल रहा है। बादशाह सिंह लोकायुक्त की जांच में फंसे थे जिसके बाद उन्हें पार्टी से बर्खास्त कर दिया गया था। ज्ञात हो कि श्री सिंह बसपा के प्रभावशाली मंत्रियों में से एक थे जिन्होंने कभी मध्य प्रदेश विधान सभा चुनाव में प्रमुख भूमिका अदा की थी। बादशाह सिंह के पार्टी से हटने के बाद बीकापुर के विधायक जीतेन्द्र सिंह बबलू को पार्टी हटा उनकी विधायकी समाप्त कर दी गयी। जीतेन्द्र पर आरोप था कि उन्होंने कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष डा. रीता बहुगुणा जोशी के घर में आग लगायी थी।
बबलू के बाद बसपा ने धनंजय से किनारा किया और पुलिस धनंजय को पकड़ ले गयी। दोहरे हत्याकाण्ड के आरोपी सांसद धनंजय को यदि मुख्यमंत्री मायावती की सरपरस्ती मिली होती तो पुलिस उन्हें छू भी नहीं सकती थी कि जिस मामले में उन्हें गिरफ्तार किया गया वह एक वर्ष पूर्व का था। धनंजय की गिरफ्तारी ऐसे वक्त में की गयी है जबकि महज एक सप्ताह बाद बसपा क्षत्रिय, वैश्य मुस्लिम सम्मेलन करने जा रही है। सम्मेलन में बसपा क्षत्रियों से समर्थन मांगेगी बावजूद इसके बसपा ने जिस प्रकार एक के एक क्षत्रियों से किनारा किया उससे पार्टी इस समुदाय को क्या संदेश देना चाहती है?
हालांकि धनंजय के बारे में यह अवश्य कहा जाता है कि वह कभी बसपा के प्रिय नहीं रहे क्योंकि पूर्व में निर्दलीय विधायक के रूप में जब धनंजय ने बसपा के खिलाफ आवाज उठायी तो उन्हें जेल जाना पड़ा। बाद में लोगों के बीच धनंजय के दबदबे को देखते हुए बसपा ने 2007 में उन्हें रारी सीट से टिकट दिया और सीट बसपा के खाते में आ गयी।
वर्ष 2009 में जब लोक सभा चुनाव आए तो बसपा ने एक बार फिर धनंजय पर दांव लगाया और जौनपुर सीट बसपा को मिल गयी। धनंजय की विधायक की सीट खाली होने के बाद उनके पिता को पार्टी ने टिकट दिया और धनंजय के पिता राजदेव सिंह चुनाव जीत गए। इन सारी बातों के विपरीत धनंजय को बसपा द्वारा जेल भिजवाना किसी की समझ में नहीं आ रहा है जबकि 18 दिसम्बर को होने वाले सम्मेलन में बसपा को क्षत्रियों को प्रकरण पर जवाब देना पड़ सकता है।












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