दिल्ली भी बन सकती है आग की गोला

Palika Bazar
दिल्ली (ब्यूरो)। देश की राजधानी दिल्ली भी आग के गोले में कभी भी तब्दील हो सकती है। राजधानी का सबसे सुरक्षित माने जाने वाला सिविक सेंटर हो या कनाट प्लेट का सबसे भीड़भाड़ वाला पालिका मार्केट या फिर एम्स या सफदरजंग अस्पताल। जहां आग के बचाव के लिए साधन तो हैं पर साधन को चलाने के लिए किसी के पास हुनर तक नहीं है और यदि फायर ब्रिगेड को सूचना भी मिली तो उसके पहुंचने से पहले ही सब कुछ स्वाहा हो चुका होगा।

यदि आप मंत्रालयों का भी दौरा करें या फिर विभिन्न संगठनों के कार्यालयों को देखें तो आपके हाथ निराशा ही हाथ लगेगी क्योंकि वहां आग से लड़ने के लिए साधन तक मौजूद नहीं है। विभिन्न सेंटरों का जब वनइंडिया ने मौका मुआयना किया तो उसके हाथ निराशा ही हाथ लगी। क्योंकि अस्पतालों में आग से लड़ने के लिए यंत्र तो दिखे पर या तो वे पुराने हो गए हैं या फिर उसे चलाने के लिए कोई तैनात नहीं है। तीन चार जगहों पर कुछ कर्मचारी मिले भी तो पता चला कि वे फायर ब्रिगेड के कर्मचारी ही नहीं बल्कि उन्हें कंटैक्ट पर रखा गया है, जो आग से बचाव के बारे में तो जानते हैं पर उनका पहला लक्ष्य अपनी जान बचानी है।

इसी प्रकार के एक कर्मचारी योजना भवन में भी मिला। हालांकि संवाददाता ने अपना नाम नहीं बताया तो बात ही बात में उसने कहा कि कोलकाता कि घटना के बारे में वह कुछ नहीं जानता है। पर आग लगी तो सबसे पहले वह विभाग को सूचना देगा और उसके बाद अपनी जान बचाने की कोशिश करेगा। हालांकि सीधा साधा दिखने वाला यह कर्मचारी कुछ ज्यादा पढ़ा लिखा भी नहीं था। उसके बाद संवाददाता योजना भवन से सीधे कनाट प्लेट स्थित पालिका मार्केट पहुंचा। अंडरग्राउड बना पालिका मार्केट में हमेशा हजारों लोग रहते हैं। निकलने के लिए चार गेट। चारों गेट पर तैनात सुरक्षा कर्मी।

पर आग से बचाव के लिए हमने यंत्र की पड़ताल करी तो पता चला कि आग से सुरक्षा के लिए हरेक दुकानदार के पास फायर ब्रिगेड से एनओसी मिला हुआ है पर दुकानों में फायर से लड़ने के लिए यंत्रों नहीं है। जब संवाददाता ने जानना चाहा तो दुकानदार कहने लगे अरे साहब फायर ब्रिगेड है न। वहीं सब कुछ देख लेगा। हमलोग आग से लड़ने में सक्षम भी होते तो आग लगेगी तो हम पहले अपनी जान बचाने की कोशिश करेंगे। यानी दिल्ली के दिल में आग का डर तो है पर उसके लड़ने के लिए साधन की कमी के साथ जागरूकता की भी कमी है। यदि ऐसा नहीं होता तो लोग कम से कम इससे लड़ने का उपाय के साथ साधन जरूर अपने पास रखते। अस्पतालों में भी कमोवेश यही स्थिति है। साधन पुराने और जंग लगे या फिर लगे भी है तो चलाने के लिए कोई नहीं है। इसलिए आवश्यक है कि इसे चलाने और इसके बारे में जागरूकता फैलाने की।

आपको बता दें कि शुक्रवार को तड़के कोलकाता के एएमआरआई अस्पताल में आग लगने से 90 लोगों की मौत हो गई। पर इस मौत पर केवल दिल्ली मातम मना रही है न कि उसके लड़ने की उपाय कर रही है। वैसे देश ने आग से 15 साल में सैकड़ों को खोया है औऱ करोड़ों रुपये स्वाहा हुए हैं। 20 नंवबर 2011 को ही पूर्वी दिल्ली में स्थित एक सामुदायिक पार्क में किन्नरों के समागम के दौरान आग लग गई थी जिसमें 15 लोगों की मौत हो गई थी और 34 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। वहीं दिल्ली से सटे मेरठ में 10 अप्रैल 2006 को आग लगी थी। उसमें 50 लोगों की मौत हो गई थी औऱ सैकड़ों लोग घायल हुए थे।

वैसे दिल्ली के दिल में अभी भी 13 जून 1997 की घटना दहशत बनकर बैठी हुई है जब हिंदी फिल्म 'बोर्डर' के प्रदर्शन के दौरान उपकार सिनेमाघर में आग लग गई थी। जिसमें कम से कम 59 लोगों की मौत हो गई थी औऱ 100 लोग गंभीर रूप से घायल हो गए थे। पर दिल्ली इससे सीख नहीं ले रही है। माल, सिनेमाघर, बाजार सभी जगह असुरक्षित है। जरूरत है सिर्फ जागरूकता की, आग से लड़ने के लिए आत्मविश्वास की। मनोबल की। संकट से लड़ने की जज्बात की।

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+