भगवा नहीं हाथी की सवारी चाहिए बाबा रामदेव को!

अपने योग के जरिये घातक बीमारियों को जड़ से मिटाने का दावा करने वाले विनम्र बाबा रामदेव अचानक काफी मुखर क्यों हो गये? यूपी विधानसभा चुनाव पर नजर डालें तो कहीं बाबा बसपा का हाथ थाम कर हाथी की सवारी करने की तैयारी में तो नहीं हैं?
योग के जरिये मनुष्य के अंदर फैली आग को शांत करने वाले बाबा रामदेव आज खुद अपने मुंह से आग उगल रहे हैं। उनके कथनों में जहर की तीव्रता देखी जा रही है। वो सत्ताधारी कांग्रेस के खिलाफ अब कुछ भी कहने से परहेज नहीं करते हैं। उनके योग शिविरों में अब अनुलोम-विलोम की बातों के साथ-साथ काले धन और भ्रष्टाचार की कथाएं सुनने को ज्यादा मिलती है।
जाहिर सी बात है उन्होंने पंगा देश पर सबसे ज्यादा राज्य करने वाली कांग्रेस सरकार से लिया है और न्यूटन का तीसरा नियम कहता है कि अगर क्रिया होगी तो प्रतिक्रिया भी जरूर होगी। सो बाबा रामदेव पर भी आरोपों का दौर जारी है। वह भी कई सवालों के घेरे में खड़े हैं। कांग्रेस ने बाबा रामदेव पर आरएसएस और भाजपा का दूत होने का आरोप लगाया था। जिससे बाबा ने हमेशा इंकार किया है, लेकिन सोचने वाली बात यह है कि बाबा को हमेशा भाजपा बंधुओं के ही साथ क्यों देखा जाता है?
उनके मंच पर भाजपा के दिग्गज नेताओं और आरएसएस के प्रतिनिधियों को सजदा करते हुए देखा गया। कांग्रेसी नेताओं ने तो दावा किया है, कि आने वाले यूपी और उत्तराखंड चुनावों में जरूर बाबा रामदेव को भाजपा से टिकट मिलने वाला है। लेकिन गुरूवार को इलाहाबाद में जो कुछ भी हुआ उससे कांग्रेसियों के शक की सुई दूसरी दिशा में घूम गयी है।
अपनी यात्रा के जरिये प्रयाग नगरी पहुंचे बाबा रामदेव ने जमकर यूपी सुप्रीमो मायावती के कसीदे पढ़े। जिसे जिस किसी ने भी सुना वो अचरज में रह गया। कांग्रेस के खिलाफ तीखी वाणी बोलने वाले बाबा रामदेव ने राहुल गांधी को मायावती के आगे नासमझ और कमजोर बता दिया।
इसके बाद तो कांग्रेसियों का गुस्सा होना लाजिमी था। सो उन्होंने विरोध जताया। लेकिन इस बार हमेशा की तरह बाबा ने वारों को सहा नहीं और आक्रोश का जवाब अपने बल से दिया। उनके सिक्योरिटी गार्डो ने जमकर कांग्रेसियों को पीट दिया। चूंकि मायावती के कसीदे उन्होंने पढ़े थे और राज्य में सत्ता बसपा की है, सो मायावती के अधिकारियों और सामने खड़े पुलिसवालों ने बाबा रामदेव के साथियों और गार्डों को छुआ तक नही, उल्टा कांग्रेसियों को ही हिरासत में ले लिया।
यूपी में सत्ता के लिए चल रही राजनीतिक उठापटक यह बात सोचने पर मजबूर करती हैं कि हो सकता है कि बाबा रामदेव हाथी की सवारी की फिराक में हों। संभावना यह भी है कि कमल की सुगंध और भगवा रंग अब बाबा को रास नहीं आ रहा हो और वो नीले रंग में रंगना चाहते हैं। क्योंकि वो पिछले लंबे अरसे से कह रहे हैं कि मायावती के राज्य में वो अपना शिविर लगाना चाहते हैं। गौर करने वाली बात यह भी है कि मायावती ने भी बाबा रामदेव पर अपने विचार अब तक प्रकट नहीं किये हैं।
फिलहाल यह सब अभी कयास ही है। क्योंकि सभी विरोधी दल कांग्रेस को सत्ता विहीन करना चाहते हैं और राजनीति में कब क्या हो जाये यह कह पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। इसलिए बाबा रामदेव विरोधियों के लविंग लिस्ट में हो सकते है। उन्हें कितना जनाधार मिल सकता है, इस बात का आंकलन करने के लिए ही वो अपनी स्वाभिमान यात्रा पर निकले हों।
खैर अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी लेकिन इतना तय है कि सत्ता की धरातल पर पैर टिकाने के लिए राजनीति में कुछ भी हो सकता है, यह बात जितनी सच है, उतना ही सच यह भी है कि सत्ता का लोभ इंसान से बहुत कुछ ऐसा करवा जाता है, जो खुद कभी इंसान भी सोच नहीं सकता है। यह तो एक ऐसी अगन है, जो कब लग जाये पता नहीं चलता है और बाबा रामदेव भी एक इंसान ही हैं।












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