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शहीदों के मानवाधिकारों की चिंता क्यों नहीं- सुप्रीम कोर्ट

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Supreme Court
नई दिल्ली। आतंकवादियों के प्रति कुछ लोगों की हिमायत पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनया है। शीर्ष कोर्ट ने कहा कि शहीदों के घरवालों की किसी की चिंता नहीं, किसी आतंकवादी को सजा हो जाती है तो कुछ लोगों को मानवाधिकार की चिंता सताने लगती है। शीर्ष अदालत ने सवाल उठाया कि आखिर कोई उन लोगों के मानवाधिकारों की बात क्यों नहीं करता, जो भूख से दम तोड़ते हैं। खुदकुशी करने वाले किसानों या फिर आतंकी हिंसा में अपनी जान गंवाने वाले सुरक्षाकर्मियों के हक की फिक्र क्यों नहीं की जाती।

पंजाब के आतंकवादी देविंदर पाल सिंह भुल्लर की अपील पर सुनवाई करते हुए जस्टिस जीएस सिंघवी और जस्टिस एसजे मुखोपाध्याय की बेंच ने कहा कि हिंसा के शिकार लोगों की मनोदशा के बारे में क्या सोचा जा रहा है? संसद की हिफाजत करते वक्त कई सुरक्षाकर्मियों ने अपनी जान गंवा दी थी। उन बहादुर लोगों को एक दिन में ही भुला दिया गया। जिस मामले में भुल्लर दोषी ठहराया गया है उसमें भी ऐसा ही हुआ। नौ सुरक्षाकर्मी मारे गए और 29 लोग जख्मी हो गए थे। क्या किसी ने उनकी परेशानी जानने की कोशिश की है। आखिर उन लोगों के मानवाधिकारों का क्या हुआ?

गौरतलब है कि सितंबर 1993 में हुए बम धमाका मामले में भुल्लर को फांसी की सजा सुनाई गई है। उसने सरकार की ओर से उसकी दया याचिका में आठ साल की देरी किए जाने के आधार पर इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की है। भुल्लर की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता केटीएस तुलसी ने दलील दी कि उसकी दया याचिका 2003 से लंबित है जो दोषी के प्रति क्रूरता है। तुलसी के इस बयान के बाद ही बेंच ने मानवाधिकारों को लेकर यह टिप्पणी की। अधिवक्ता ने जब यह कहा कि मौत की सजा के खिलाफ दुनिया भर में रायशुमारी हो रही है तो बेंच ने कहा कि हां, हम एक सभ्य राष्ट्र हैं।

कई लोग भूख से मरते हैं, किसान खुदकुशी करते हैं। आखिर उनके इंसानी हकों का क्या हुआ? शीर्ष अदालत ने अधिवक्ता से पूछा कि क्या सरकार की ओर से दया याचिका में देरी किया जाना मौत की सजा को परिवर्तित करने का आधार बन सकता है। अब देखना है कश्मीर में हिंदुओं के कत्लेआम पर चुप रहनेवाले और आतंकवादियों के प्रति नरम रवैया अपनाने वालों को कोई समझ आती है या नहीं। या पहले की तरह ही अपने को पढ़ा लिखा दिखाने के लिए कसाब जैसों के मानवाधिकार के लिए वे नौटंकी करते रहेंगे।

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English summary
Death row convict Davinder Pal Singh Bhullar faced peculiar questions from the Supreme Court over human rights of those who died during terrorist attacks. We have forgotten those who died during the Parliament attack. We always forget. But, has anybody tried to carry out a research on the psyche of such victims of crime?"
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