कई शहरों व गांवों में मनी काली दीवाली

उपवास कर रहे लोग योजना आयोग से नाराज हैं। उनकी मांग है कि योजना आयोग गरीबी रेखा के मानक शहर में प्रतिदित 32 रूपये और गांव में 26 रुपये खर्च करने वालों को रेखा से ऊपर मानने की परिभाषा को वापस ले और गरीबी रेखा से नीचे यापन करने वालों की सूचियां ग्राम सभा और वार्ड सभा तैयार करें।
हरदोई के लालपुर गांव में उपवास पर बैठे मैग्सैसे पुरस्कार से स मानित संदीप पांडेय का कहना है कि सरकार की आॢथक नीति ने जो हालात पैदा किये हैं उसमें गरीब के लिये दीपावली मनाने की गुंजाईश बिल्कुल भी नहीं है। योजना आयोग ने उच्चतम न्यायालय में गरीबी रेखा की हास्यास्पद परिभाषा दी है। सरकार ने ऐसी नीति अपनायी है कि गरीब की कीमत पर पहले से ही स पन्न लोगों को ज्यादा लाभ मिले।
संदीप पांडेय ने कहा कि गरीबी या महंगाई पर कैसे काबू पाया जाय इसका कोई अंदाजा सरकार को नहीं है, इसीलिये गरीबों का जीना मुश्किल हो रहा है। सरकार किसानों की आत्महत्या.भुखमरी से मौत, बच्चों का कुपोषण या प्रसव के दौरान मां की मृत्यु दर पर काबू पाने में सरकार विफल रही है।
उन्होंने कहा कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली का लोक व्यापीकरण हो यानी हर गरीब को कम कीमत पर अनाज मिले। सरकार अनाज के बदले नगद देने की योजना को वापस ले। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) में न्यूनतम मजदूरी 250 रूपया हो तथा समान शिक्षा प्रणाली को शिक्षा के अधिकार अधिनियम का हिस्सा बनाया जाये। उन्होंने कहा कि राजधानी लखनऊ, मुरादाबाद, गुजरात के अहमदाबाद, रायपुर और अन्य कई शहर तथा गांव में लोग योजना आयोग की गरीबी रेखा की दी गयी परिभाषा के खिलाफ पिछले चार दिन से उपवास पर हैं।












Click it and Unblock the Notifications