पांच साल में ध्वस्त हो जाएगा ताजमहल

मुगल काल में बनी ताज की नींव में वही तकनीक इस्तेमाल की गई है जो उस दौर की दूसरी ऐतिहासिक इमारतों को बनाने में की गई थी। ऐसा माना जाता है कि ताजमहल के चारों तरफ एक हजार से भी ज्यादा कुएं खोदे गए हैं। इन कुओं को ईंट पत्थर चूना और लकड़ी से भर दिया गया है। कुओं में आबनूस और महोगनी की लकडि़यों के लट्ठे डाले गए। ये कुएं ताजमहल की नींव को मजबूत बनाते हैं।
इन कुओं को इस तरह बनाया गया कि यमुना नदी के पानी से नमी मिलती रहे। इसकी वजह ये है कि नींव में मौजूद आबनूस और महोगनी की लकड़ी को जितनी नमी मिलेगी वो उतनी ही फौलादी और मजबूत रहेंगी। इससे ताजमहल की नींव भी मजबूत बनी रहेगी। गौरतलब है पिछले तीस साल से किसी को ताजमहल की नींव देखने की अनुमति नहीं दी गई। मशहूर इतिहासकार रामनाथ कहते हैं कि ताजमहल का आधार यमुना नदी है और यह नदी सूख गई है। वह कहते हैं ताजमहल को बनानेवाले लोगों ने कभी नहीं सोचा होगा कि यमुना नदी सूख भी सकती है। अगर यह नदी सूख गई तो ताजमहल भी नहीं बचेगा। यमुना नदी के किनारे लगे तमाम उद्योगों में नदी के पानी का इस्तेमाल होता है। प्रदूषण बढ़ गया है। सड़कों के नाम पर लगातार पेड़ काटे जा रहे हैं।
पेड़ों के कारण आंधी के दौरान ताजमल का धूल से बचाव होता रहा है। हर साल यमुना का पानी पांच फीट नीचे जा रहा है। इस वजह से पानी की जबरदस्त कमी होती जा रही है। ताजमहल में 40 फीट ऊंची चार मीनारें बनाई गई हैं। जो नींव को संतुलन देती हैं। इन्हें इस तरह बनाया गया है कि ये बाहर की ओर थोड़ी झुक सकती हैं। इसे इसलिए बनाया गया है कि भूकंप आने पर ये मीनारें मकबरे पर नहीं गिरेंगी। उत्तर प्रदेश प्रदूषण बोर्ड के अधिकारी बीबी अवस्थी कहते हैं कि ताजमहल को बचाने के लिए ब्लू प्रिंट तैयार है। लेकिन पैसे की कमी के कारण यह 2003 से बंद पड़ा है। अनुमान है कि ताजमहल को बचाने के लिए जो प्रोजेक्ट तैयार किया गया है उसपर करीब 100 मिलियन डालर की जरूरत पड़ेगी।












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