छात्रों और मीडिया ने मूर्ति को गलत, भगत को सही ठहराया
उनका कहना था कि अगर उनके पास कोचिंग नहीं होती तो वो कभी भी आईआईटी में घुसने की सोच ही नहीं सकते थे। क्योंकि वो एक ग्रामीण इलाके से हैं। 12वीं तक की पढ़ाई उन्होंने कैसे की है, वो ही जानते हैं इसलिए वो मानते हैं कि कोचिंग संस्थान ने आईआईटी का सपना देखने वालों की मदद की है। अगर कोचिंग में व्यवसायी करण हो रहा है तो वो दूसरा मुद्दा है। इसलिए उनको चेतन भगत की बात को सही माना। उन्होंने कहा कि उन्हें खुशी हुई कि चेतन भगत ने अपने आईआईटी स्टूंडेट होने का मान रखा।
वहीं इस विषय पर हमने जब कुछ नामीगिरामी पत्रकारों से बात की तो उनकी सोच भी अभिषेक बाजपेयी से मिलती जुलती दिखायी पड़ी। ईटीवी जैसे संस्थान में बुलेटिन प्रोड्यूसर रह चुके कानपुर के आलोक कृष्ण दीक्षित ने कहा कि वो भी चेतन भगत की बात सहमत है, आईआईटी एक प्रतिष्टित संस्था है, जिसकी अपनी मान्यता है। उसमें जो कुछ भी परिवर्तन करना है, वो वहां बैठे लोग अच्छी तरह से कर सकते हैं, इस बारे में हमें नहीं सोचना चाहिए। हम इस बारे मे कमेंट करने वाले कौन होते हैं?
वहीं इस बारे में बैंगलोर में काम कर रहे कुछ आईटी के कार्यकर्ताओं ने कहा कि कोचिंग से आईआईटी की शाख कैसे गिर सकती है? वो तो एक माध्यम है आईआईटी के गेट तक पहुंचने का। बच्चे जो भी सीखते हैं वहां जाकर सीखते हैं। जब आईआईटी क्रीम बच्चों को लेता है तो रिजल्ट खराब कैसे हो सकता है। इसलिए मूर्ति जी ने जो कहा वो गलत है और अप्रासंगिक है।
गौरतलब है कि इन्फोसिस के संस्थापक एन आर नारायणमूर्ती ने टीवी चैनल पर बात करके कहा था कि कोचिंग सैंट्ररों ने आईआईटी का स्तर गिरा दिया है। बच्चे रट-रटाकर पास हो जाते हैं और जब नौकरी में आते हैं तो वो उतना अच्छा नहीं कर पाते, जितना उनसे अपेक्षा की जाती है। इससे आईआईटी का नाम खराब होता है। जिस पर मशहूर लेखक चेतन भगत ने विरोध जताया और कहा कि बच्चों को दोष देने से अच्छा है कि सिस्टम को बदला जाये।













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