250 साल से विसर्जित नहीं हुई दुर्गा प्रतिमा

लोगों ने प्रतिमा उठाने का बहुत प्रयास किया, लेकिन किसी भी रूप में सफलता नहीं मिली। आखिरकार रात के वक्त मां काली ने मुखर्जी के स्वप्न में आकर कहा कि उनकी प्रतिमा का विसर्जन न किया जाए और मां का अंश प्रतिमा में विराजमान है।
वाराणसी में वैसे से ढेरों मंदिर हैं शायद यही कारण है कि गंगा तट पर बसे इस नगर को धार्मिक नगरी कहा जाता है। कई लोगों को यह नहीं मालूम को वाराणसी कई मायनों में पूजनीय है। नवरात्र के अवसर पर शहर के माता के मंदिरों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ होती है और लोग मां का अर्शीवाद लेते हैं। धार्मिक नगर में हमेशा ही पूजा पाठ होती रही। नवरात्र के अवसर पर ढेरों मूर्तियां बनायी जाती हैं और नवरात्र उपरान्त उनका विसर्जन किया जाता है।
एक मूर्ति ऐसी भी है जिसे एक मूर्तिकार ने बनाया 17वीं शताब्दी में बनाया था। यह मूर्ति उस वक्त से एक घर में विराजमान है मान्यता है कि उस मूर्ति में मां का अंश है और वहां मांगी गयी मुराद कभी अधूरी नहीं जाती। मूर्ति का निर्माण में मिट्टी, पुवाल, सुतली एवं बांस के टुकडों से किया गया है। पुरानी दुर्गावाडी के नाम से मशहूर शहर की एक गली के एक मकान में यह मूर्ति स्थापित है। उस परिवार के बुजुर्ग बताते हैं कि मूर्ति का निर्माण पश्चिम बंगाल के हुबली जिले के काली प्रसन्न मुखर्जी ने यहां आकर किया था।
1767 की नवरात्र के दौरान काली प्रसन्न मुखर्जी ने हमेशा की भांति मां की प्रतिमा बनायी एवं पूजा अर्चना के बाद इसी मकान में इसकी स्थापना की। विजयदशमी को विसर्जन के बाद जब मूर्ति उठायी जाने लगी तो वह अपने स्थान से टस से मस नहीं हुई। थकहार कर लोगों ने विसर्जन का इरादा ही त्याग दिया। उसी दिन रात में स्वप्न में काली प्रसन्न मुखर्जी को मां ने दर्शन दिया एवं कहा कि उन्हें हटाने का प्रयास न किया जाए। वह गुड़-चने से ही संतुष्ट रहेंगी। इसके बाद मूर्ति का स्थान पवित्र हो गया तथा वहां हर वर्ष भक्तों की भीड़ जमा होती। कहा जाता है कि मां ने अपने ढेरों भक्तों की मुराद पूरी की। तब से लेकर आज तक मां दुर्गा की बराबर पूजा हो रही है।












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