दिशा से भटक न जाये अखिलेश यादव का क्रांति रथ

उत्‍तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को अपना टार्गेट बनाते हुए समाजवादी पार्टी के युवराज अखिलेश यादव अपना क्रांति रथ लेकर निकल पड़े हैं। इस सप्‍ताह पहले राउंड में उन्‍होंने लखनऊ से कानपुर और दूसरे रांउड में सोनिया गांधी के गढ़ पर धावा बोला। हर जगह वो मंच से मायावती सरकार की नीतियों को जनता विरोधी करार देते हुए आगे बढ़ते गये।

सपा युवराज की रथ यात्रा में युवाओं की भीड़ देखने लायक थी। जहां-जहां उन्‍होंने अपने संबोधन दिये, वहां-वहां हजारों लोग उन्‍हें सुनने के लिए एकत्र हुए, लेकिन फिर भी कहीं ना कहीं सपा की जीत के सुर दूर-दूर तक नहीं सुनायी पड़ रहे हैं? आज हम उसी पर फोकस कर रहे हैं- आखिर क्‍यों सपा की रथयात्रा इतनी इफेक्टिव क्‍यों नहीं दिख रही है।बता रहे हैं अजय मोहन

कार्यकर्ताओं की पुरानी सोच

विधानसभा चुनाव में फैजाबाद में अयोध्‍या सीट से खड़े हो रहे पवन पांडेय से जब चुनावी रणनीति के बारे में पूछा तो वो एक भी साफ जवाब नहीं दे पाये। पवन पांडेय से पूछा कि वो चुनाव जीतने के लिए क्‍या करेंगे, तो जवाब मिला कि हम समाजवादी पार्टी की पिछली उपलब्धियों के बारे में जनता को बतायेंगे और मायावती शासन की सच्‍चाईयों को लोगों के सामने रखेंगे। इसके तुरंत बाद हमने समाजवादी छात्रसभा के लखनऊ महानगर अध्‍यक्ष फखरुल हसन उर्फ चांद मियां से बात की। चांद मियां ने बढ़-चढ़ कर अखिलेश यादव की रथयात्रा के बारे में बताया, लेकिन क्‍या करेंगे के सवाल पर जवाब उनका भी यही था।

अब सवाल यह उठता है कि कन्‍या विद्या धन और छात्रसंघ के ताले खुलवाने की बात पूरा उत्‍तर प्रदेश जानता है, लेकिन महज कुछ उपलब्धियों के आधार पर अपने अभियान को सफल बताना ईमानदारी वाली बात नहीं। एक सबसे बड़ी बात यह कि समाजवादी पार्टी की नींव छात्र और युवा ही हैं और युवाओं को आकर्षित करने के लिए सपा आज भी पुराने रवैये पर चल रही है।

युवाओं के लिए गलत अप्रोच

आज के युवा को अगर अपनी ओर खींचना है तो इंटरनेट एक सबसे बड़ा जरिया बन सकता है, लेकिन सपा इसमें काफी पिछड़ी है। इंटरनेट पर कैम्‍पेन, मोबाइल पर एसएमएस किसी भी पार्टी के लिए इस समय जादू का काम कर सकते हैं, लेकिन सवाल यह उठता है कि पुराने राग गाने वाले को पॉप म्‍यूजिक कैसे सिखाया जाये। हमारे इस सवाल पर छात्रसभा के लखनऊ महानगर अध्‍यक्ष ने खुद माना कि उनकी पार्टी इंटरनेट कैम्‍पेन के मामले में काफी पीछे है। उन्‍होंने माना कि पार्टी की साइट समय पर अपडेट तक नहीं होती।

समाजवादी पार्टी को इससे पहले मिली जीत का सबसे बड़ा कारण था छात्रसंघ पर लगे ताले। अब लिंगदोह कमेटी की सिफारिशें लागू होने के बाद से किसी भी पार्टी को छात्रसंघ में रुचि नहीं रह गई है, क्‍योंकि अगर छात्रसंघ चुनाव लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों के आधार पर कराये जायें, तो किसी भी पार्टी को खास लाभ नहीं मिलेगा। कारण यह कि उसमें हाई लेवल के प्रचार-प्रसार पर रोक है।

जातिगत राजनीति

बिहार में नीतीश कुमार की जीत के बाद अब जातिगत राजनीति से ऊपर उठकर बात करनी होगी। अखिलेश यादव ने अपनी क्रांति रथ यात्रा के दौरान अपने भाषण में कहा, "समाजवादी पार्टी की सरकार ने सामाजिक सद्भाव और राज्य का विकास दोनों पर बराबर ध्यान दिया था। मुस्लिम समुदाय के लिये विशेष योजनाएं रोजी-रोटी से लेकर उनके सम्मान और उर्दू भाषा तक के लिये श्री मुलायम सिंह यादव ने अपने मुख्यमंत्रित्वकाल में ध्यान दिया था। समाजवादी पार्टी ही सच्चर कमेटी और रंगनाथ मिश्र आयोग की सिफारिशों को ईमानदारी से लागू कराने के लिये प्रतिबद्व है। बसपा मुख्यमंत्री तो सिर्फ झूठ और छलकपट की राजनीति करना जानती है।" इस तरह के भाषण से साफ जाहिर हो रहा है कि आज भी सपा जाति और धर्म के नाम पर वोट मांगती है। अगर यह जंग जीतनी है तो सपा को यह सोच बदलनी होगी।

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