पीएम साहब 32 रुपए में कैसे चलेगा खर्चा?

Manmohan Singh
नई दिल्‍ली। देश के बड़े अर्थशास्त्रियों में जिस प्रधानमंत्री की गिनती की जाती है, वो गरीबों के साथ इतना घटिया मजाक करेंगे, यह शायद ही किसी ने सोचा होगा। अपने कार्यकाल में सबसे ज्‍यादा महंगाई बढ़ाने के लिए मशहूर यूपीए सरकार ने मंगलवार को तब तो हद की कर दी, जब सुप्रीम कोर्ट के सामने यह कहा कि शहर में 32 रुपए और गांव में 26 रुपए प्रति दिन खर्चा चलाने के लिए काफी हैं। सही मायने में देखा जाये तो यह उन गरीबों के साथ घटिया मजाक है, जो महीनों तक अपने बच्‍चों को 120 रुपए किलो सेब और 170 रुपए किलो अनार जैसे फल नहीं दे पाते।

गरीबी रेखा के लिए निर्धारित आंकड़ों और वास्‍तविक मूल्‍यों की तुलना करें तो सरकार के लिए शर्म से डूब मरने जैसे हालात दिखाई देंगे। सरकार कहती है कि बेंगलुरु, चेन्‍नई, दिल्‍ली, मुंबई जैसे शहरों में 32 रुपए में खर्च कैसे चल सकता है। चलिये हम बेंगलुरु को उदाहरण के तौर पर लेते हैं। यह वो शहर हैं, जहां एक कमरे का कम से कम किराया 2500 रुपए प्रति माह होता है, यानी करीब 80 रुपए प्रति दिन। कमरे से निकलते ही अगर आप दो किलोमीटर तक सरकारी बस से यात्रा करते हैं तो एक तरफ से 9 रुपए लगता है। यानी किराये में कम से कम 18 रुपए खर्च होंगे।

काम करते वक्‍त अगर चाय पीने का मन करता है तो उसे 4 रुपए चाय के लिए देने होंगे, ध्‍यान रहे यह वो गरीब है, जिसने नाश्‍ता नहीं किया है। सीधे खाने के लिए जब वो ढाबे पर जाता है तो कम से कम 30 रुपए में उसे साउथ इंडियन मील्‍स मिलता है। दिन भर शारीरिक मेहनत करने वाला गरीब 15 रुपए के कर्ड राइस पर जी नहीं सकता।

सरकार अगर उसे 32 रुपए प्रति दिन के हिसाब से दे भी दे, तब भी यह गरीब शाम के खाने के लिए भीख मांगता दिखायी देगा। जी हां क्‍योंकि शाम के खाने के लिए दोबारा उसे 32 रुपए, चाय नाश्‍ते के लिए 20 रुपए देने होंगे।

प्रधानमंत्री द्वारा हस्‍ताक्षरित इस रिपोर्ट में गरीबी रेखा की जो सीमा निर्धारित की गई है, उससे यह साफ है कि गरीब आदमी को 120 रुपए प्रति किलो बिकने वाले सेब और डेढ़ सौ रुपए प्रति किलो बिकने वाले अनार खाने का कोई हक नहीं। यहां तक 3 रुपए का केला खाने तक का अधिकार नहीं। जरा सोचिये ऐसे गरीब के अंदर विटामिन ए, बी, सी से लेकर कै‍लशियम और आयरन तक हर चीज़ की कमी होगी। ऐसे परिवार जिन्‍हें इस गरीबी रेखा के कीरब रखा जाता है, उनके बच्‍चों को अच्‍छे कपड़े पहनने का कोई अधिकार नहीं। ऐसे परिवार के बच्‍चों को टीवी देखने का अधिकार नहीं।

सरकार की नजर में गरीब बना है सिर्फ मर-मर कर, भूखे पेट जीने के लिए और बीमार पड़ने पर सरकारी अस्‍पतालों में मुफ्त इलाज कराने के लिए। गरीब बना है सिर्फ पैदल चलने के लिए, जिनके बच्‍चों को स्‍कूल में मुफ्त शिक्षा और मिड-डे-मील के नाम पर खाना दिया जाता है। ऐसे गरीब परिवार के बच्‍चों को दूध पीने तक का अधिकार नहीं। इस रिपोर्ट को देखते हुए जनता के मन में सिर्फ यही सवाल उठ रहा है- पीएम साहब आप ही बताइये 32 रुपए में कैसे चलेगा खर्चा।

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