दिल्ली: 50 रुपये घूस, 25 साल मुकदमा, नहीं मिला प्रमाण

न्यायमूर्ति एसके मिश्रा ने फैसले में कहा कि मामला करीब 25 वर्ष पुराना है। उन्होंने सीबीआई द्वारा मामले में मुकदमा न चलाने के निर्णय पर भी आपत्ति जताई। अदालत ने कहा कि आरोपी का अपराध साबित किया जाना चाहिए या फिर उसे बरी किया जाना जरूरी है। संविधान में कर्मचारियों को संरक्षण प्रदान किया है जिसके तहत उसे सफाई में पूरा मौका दिया जाना जरूरी है लेकिन रेलवे से उसे पूरा मौका प्रदान नहीं किया। अत: वे रेलवे, अपील अथारिटी के उस फैसले को खारिज करते हैं जिसमें उसे बर्खास्त किया गया था। याची वर्तमान में अवकाश ग्रहण की हालत में है। अत: उसे बहाल करने का आदेश नहीं दिया जा सकता लेकिन उसे वेतन मिलना जरूरी है।
अदालत ने रेलवे को याची को बर्खास्तगी के समय यानी 17 जून 1992 से अब तक वेतन का 50 प्रतिशत राशि और अन्य भत्ते प्रदान करने का निर्देश दिया है। पेश मामले के अनुसार, प्रताप सिंह उत्तरी रेलवे मुरादाबाद मंडल में क्लर्क पद पर कार्यरत था। वहीं खलासी का काम करने वाले रामप्रकाश ने विभाग में ऋण के लिए आवेदन किया और प्रताप सिंह ने उसके आवेदन को आगे करने के लिए 50 रुपये रिश्वत मांगी। रामप्रकाश की शिकायत पर सीबीआई ने प्रताप सिंह को 3 अक्तूबर 1988 को रंगे हाथ पकड़ लिया।
आखिर रेलवे में विभागीय जांच में उसे दोषी पाते हुए 17 जून 1992 को बर्खास्त कर दिया। सीबीआई ने उसके खिलाफ देहरादून अदालत में आरोपपत्र दाखिल करने की अपेक्षा जून 2008 को मुकदमे को बंद करने का आवेदन दाखिल कर दिया। सीबीआई ने तर्क रखा कि अभियुक्त के खिलाफ ठोस साक्ष्य नहीं मिल पाए और 20 वर्ष बीतने के बाद अब साक्ष्य एकत्रित नहीं किए जा सकते। इसके अलावा विभागीय जांच में कुछ साक्ष्यों की सील भी टूट गई।












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