10 साल तक मां के पेट में पड़ा रहा बच्‍चे का शव

मुजफ्फरनगर। 'सब्र को दरिया कर देते हैं, आंसू रूसवा कर देते है। जख्म पर मरहम रखने वाले जख्म को गहरा कर देते हैं।' विख्यात शायर डा. नवाज देवबंदी ने पता नहीं किन हालातों के मद्देनजर इन पंक्तियों को शेर के रूप में पिरोया होगा, लेकिन मुफलिसी का जीवन जीने वालों के साथ अक्सर ये पंक्तियां साथ चलती देखी जा सकती हैं। मुफलिसी के चलते कई बार जीवन में ऐसा घटनाक्रम घटित हो जाता है कि जीवन में सहयोग देने वाले उन तमाम संसाधनों से ही जख्म मिलने शुरू हो जाते हैं, जिनसे जख्मों पर मरहम की आशा की जाती है। पूरा घटनाक्रम सुनने, देखने में विचित्र व बेहद आश्चर्यजनक है, बल्कि पूरी तरह अप्राकृतिक होते हुए वर्तमान चिकित्सा विज्ञान एक बहुत बड़ी चुनौती है। इस खबर को पढ़कर आप सोचने पर मजबूर हो जायेंगे।

जीवन की यह असली कहानी 2001 में शुरु हुई जब मुजफ्फरनगर के गांव नसीरपुर निवासी इस्तखार पुत्र जहीर ने अपनी अपनी गर्भवती पत्नी नसीमा को गर्भकाल के आठवें महीने के बाद प्रसव हेतु जिला महिला चिकित्सालय में भर्ती करवाया। इस्तखार पेशे से रिक्शा चालक है और वर्षों से बेहद मुफलिसी का जीवन यापन करता चला आ रहा है। इस्तखार इसी मुफलिसी के चलते ये सोचकर महिला चिकित्सालय गया था कि यहां बेहद कम दामों में प्रसव हो जायेगा।

गरीबी के चलते नहीं करा पाया ऑपरेशन

इससे पहले इस्तखार चार स्वस्थ बच्चों का पिता बन चुका था। इसलिये अपनी पत्नी नसीमा के इस प्रसव काल को लेकर वह खास चिन्तित नहीं था, पहला दु:ख इस्तखार को तब मिला, जब जिला महिला चिकित्सालय में तैनात उपचार कर रही महिला चिकित्सक ने इस्तखार की पत्नी नसीमा के गर्भ में पल रहे शिशु के मर जाने की सूचना उसे दी। इस्तखार को दुख तो हुआ, लेकिन यह सोचकर उसने स्वयं व अपनी पत्नी को संभाला कि जो अल्लाह का मंजूर था, वह हो गया, लेकिन दुख का चक्र इस्तखार व उसकी पत्नी नसीमा के साथ उस समय शुरू हुआ, जब महिला चिकित्सक ने यह कहा कि मृत शिशु को गर्भ से निकालने के लिये ऑप्रेशन करना होगा, क्योंकि नसीमा की जान को खतरा है।

महिला चिकित्सक ने तब इस्तखार को सलाह दी थी कि वह उत्तम उपचार के लिये नसीमा को मेरठ ले जाये। इस्तखार का मन यह सुनकर ही कांप गया, क्योंकि उसकी जेब में रूपये नहीं थे। वह हिम्मत कर अपनी पत्नी नसीमा को मुजफ्फरनगर के ही द्वारिकापुरी स्थित एक निजी अस्पताल में ले गया, जहां अल्ट्रासाउंड इत्यादि कर चिकित्सक ने ऑप्रेशन जरूरी बताया और ऑप्रेशन हेतु खर्च राशि आठ हजार बता दी। मुफलिसी का जीवन जीने वाले इस्तखार के पास इतने रूपये नहीं थे। मुफलिसी की मजबूरी में आकंठ डूबा इस्तखार अपनी पत्नी नसीमा को नसीरपुर स्थित अपने घर वापिस ले गया और सब कुछ ऊपर वाले पर छोड़ दिया। अब इसे चमत्कार कहें या कुछ और।

नसीमा धीरे-धीरे समय बीतने के साथ ही उठ खड़ी हुई और प्रतिदिन घर के सामान्य कार्यों को सहजता के साथ करने लगी। देखते ही देखते दस वर्ष बीत गये। इन दस वर्षों में नसीमा ने पूर्व में जन्मे अपने चार बच्चों दो लड़के व दो लड़कियों का निकाह भी कर दिया। अब नसीमा यह भूल चुकी थी कि दस वर्ष पूर्व कभी गर्भकाल के नौवें महीने में पल रहा एक शिशु गर्भ में ही मर गया था। कुछ दिन पूर्व अचानक नसीमा के पेट में दर्द हुआ। दर्द की पीड़ा जब असहनीय हो चली तो परिजन नसीमा को लेकर जानसठ रोड स्थित वशिष्ठ हॉस्पिटल में पहुंचे। यहां तैनात चिकित्सकों ने महावीर चौक स्थित एक अल्ट्रासाउंड सेंटर से उसका अल्ट्रसाउंड कराया, जिसमें चिकित्सक ने पाया कि उसके गर्भाशय में मानवीय आकृति के अवशेष मौजूद हैं।

बस! फिर क्या था? नसीमा एवं उसके पति का दिमाग एकाएक दस वर्ष पूर्व गर्भ में हुई शिशु की मौत पर चला गया और उन्होंने चिकित्सकों को सारी बात कह सुनायी। वशिष्ठ हॉस्पिटल के चिकित्सक डा. केके अग्रवाल, डा. शांति खन्ना तथा निदेशक डा. वागिश चंद शर्मा ने तत्काल इस्तखार को ऑप्रेशन कराने की सलाह दी। हालांकि अब भी इस्तखार मुफलिसी का ही जीवन जी रहा है, लेकिन अब उसके विवाहित दो पुत्र भी घर का खर्च उठाने में कंधे से कंधा मिलाकर सहयोग कर रहे हैं। इसलिये इस्तखार ने ऑप्रेशन के लिये हामी भर दी। मंगलवार को जानसठ रोड स्थित वशिष्ठ हॉस्पिटल में नसीमा का सफल ऑप्रेशन किया गया, जिसमें नसीमा के गर्भाशय से उस शिशु के अवशेष निकाले गये।

अस्पताल के निदेशक डा. वागिश चंद शर्मा की माने तो इस तरह का केस उसके अस्पताल में पहली बार आया है। यही नहीं इससे पूर्व इस तरह के किसी केस के बारे में उन्होंने कभी सुना भी नहीं। बकौल डा. वागिश यदि अब नसीमा का ऑप्रेशन न किया जाता, तो नसीमा की जान को खतरा हो सकता था। आश्चर्यजनक यह भी है कि शिशु का मृत शरीर दस सालों तक नसीमा के पेट में सड़ता-गलता रहा और नसीमा के शरीर में किसी प्रकार कोई इंफैक्शन नहीं हुआ, वरना इन दस सालों में नसीमा के साथ कुछ भी घटित हो सकता था।

सीएमओ ने बताया अवशेष को रसोली

इस पूरे घटनाक्रम की जानकारी मुख्य चिकित्साधिकारी डा. आनंद स्वरूप को देकर जब उनसे यह जानने का प्रयास किया गया, कि इस पूरे घटनाक्रम को वे किस नजरिये से देखते हैं, तो उन्होंने वशिष्ठ हॉस्पिटल के चिकित्सकों की इस घोषणा से नाइत्तेफाकी जताते हुए कहा कि यह किसी भी दृष्टिकोण से संभव नहीं है कि मंगलवार को आप्रेशन में नसीमा के पेट से दस साल पूर्व मृत बच्चे का एक भी अवशेष मिला हो, क्योंकि यदि ऐसा होता, तो निश्चित तौर पर नसीमा के शरीर में संक्रमण फैल जाता और उसकी जान पर बन आती। अगर यह बच्चे के अवशेष नहीं थे, तो फिर क्या थे, इसके जवाब में डा. आनंद स्वरूप ने कहा कि हो सकता है यह रसोली रही हो। इस पूरे प्रकरण को उन्होंने संबंधित अस्पताल प्रबन्ध तंत्र द्वारा जांच कराने हेतु योग्य करार दिया।

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