सावन विशेष : बाजूबंद, बाजूबंद, बाजूबंद...

दोस्तों,हम लगातार आपको महिलाओं के सोलह श्रृंगार के बारे में बता रहे हैं । जानी मानी पत्रिका 'एराउंड द इंडिया' के मई अंक में छपे लेख सोलह 'श्रृंगार की महत्ता' की लेखिका 'कुमद मेहरोत्रा' ने इस विषय पर गहन अध्ययन किया है, जिसके बाद उन्होंने अपनी लेखनी से श्रृंगार का महत्व समझाया है।

कल हमने आपको श्रृंगार नंबर 10 यानी गजरे के बारे में तो आज हम आपको बताते हैं श्रृंगार नंबर 11 यानी बाजूबंद के बारें में। कुछ इतिहासकारों ने बाजूबंद मुगलकाल की देन माना है लेकिन पौराणिक कथाओं में इसकी खूब चर्चा है।

यह बड़ी उम्र में पेशियों में खिंचाव और हड्डियों में दर्द को नियंत्रित करता है। भारत में शहरी क्षेत्र में इसका चलन बहुत कम हो गया है। लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी इसकी महत्ता बरकरार है।

दक्षिण भारत में इसका चलन उत्तर भारत की अपेक्षा काफी है। यहां बाजूबंद दुल्हन को पहनाने के लिए वर पक्ष की ओर से आता है। महंगाई ने भले ही आभूषणों का संख्या कम कर दी हो लेकिन महत्व आज भी बरकरार है। अब तो बाजार में सोने के अलावा,चांदी और मोतियों से बने बाजूबंद भारी संख्या में उपलब्द्ध हैं।

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