खत्म हुई छुआछूत, अछूत महिलाओं ने किया ब्राह्मणों संग भोजन

मैला ढोने वाली 200 महिलाओं को इस कुप्रथा से मुक्त कराया गया। छूआछूत की भावना से ग्रसित महिलाओं ने काशी विश्वनाथ मन्दिर में पूजा अर्चना की। अस्पृश्य महिलाओं ने सामान्य लोगों के बीच पण्डितों की उपस्थिति में मन्दिर में बाबा विश्वनाथ के दर्शन किए। राजस्थान के अलवर एवं टोंक जिलों से महिलाओं को मुक्त कराने वाली संस्था का कहना है कि अब यह महिलाएं विंध्याचल, ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती, अमृतसर के स्वर्ण मन्दिर व दिल्ली के गिरजाघर में माथा टेकने जाएंगी।
देश ने भले ही विकास के पथ पर कई कदम आगे बढ़ा लिए हों लेकिन मैला ढोने की प्रथा एवं छूआछूत की भावना से लोग आज भी उभर नहीं पाए हैं। कुछ दिनों पूर्व जब सुलभ इण्टरनेशन संस्था ने राजस्थान के अलवर से मैला ढोने वाली महिलाओं को मुक्त कराया तो लगा कि देश अभी भी काफी पीछे हैं। उत्तर प्रदेश के इतिहास पर नजर डालें तो राजधानी लखनऊ का नाम भी इसी फेहरिस्त में आता है जहां की तंग गलियों में सफाई कर्मी अभी भी मैला ढो रहे हैं। पुराने लखनऊ के अल्पसंख्यक बाहुल्य इलाकों में यह तस्वीरें आम हैं। हालांकि सुलभ संस्था के प्रयास की सामाजिक संगठनों ने काफी प्रसंशा की।
सुलभ इन्टरनेशनल संस्थान ने महिलाओं को राजस्थान के अलवर एवं टोंक जिलों से मुक्त कराया है। यह महिलाएं इन जिलों में लम्बे अर्से से मैला ढोने का कार्य करती रही हैं। समाज में शामिल होने का प्रयास कर रही 200 महिलाओं ने पौराणिक दशाश्वमेघ घाट पर गंगा नदी में स्नान कर बाबा के मंदिर में प्रवेश किया। महिलाओं ने काशी हिन्दू विश्व विद्यालय स्थित नये विश्वनाथ मंदिर और राजघाट स्थित संत रविदास मंदिर में भी पूजा अर्चना की।
संस्था के संस्थापक डा. विंदेश्वर पाठक का कहना है कि यह कदम महात्मा गांधी के सपने का साकार करने की एक कोशिश है। उन्होंने कहा यह कोशिश आगे भी जारी रहेगी। उपरोक्त महिलाएं 21 जून को मिर्जापुर स्थित विध्यांचल मंदिर तथा 23 जून को अजमेर शरीफ स्थित ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह जाएंगी। अभियान के अगले चरण में महिलाओं को दिल्ली के गोल डाक खाना के निकट स्थित गिरिजाघर तथा अमृतसर के स्वर्ण मंदिर ले जाया जाएगा।
अस्पृश्य महिलाओं को धार्मिक स्थानों पर ले जाने का सिलसिला 1988 में राजस्थान के नाथद्वार मन्दिर से शुरू हुआ था जहां ऐसे महिलाओं की परछाई तक बर्दाश्त नहीं थी। शुरूआती दौर में इसका जमकर विरोध हुआ लेकिन बाद में सबकुछ समाप्त हो गया। आंकड़े बताते हैं कि देश में आज भी करीब एक लाख मैला ढोने काकार्य करते हैं। ज्ञात हो कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने हाल ही में अपने बयान में कहा था कि मैला ढोने की प्रथा को छह माह में समाप्त कर दिया जाए।












Click it and Unblock the Notifications