डा. शोभ नाथ- रिटायरमेंट के बाद जिऊंगा अपनी जिंदगी

कार्डियोलॉजी में डिप्लोमा करने के बाद स्वास्थ्य विभाग की सेवा कर रहे डा. शोभनाथ को मरीजों के बीच रहना काफी पसंद है। पिछले चार वर्षों से प्रशासनिक पद पर तैनात डा. शोभनाथ को अफसोस है कि अब वे मरीजों को अधिक समय नहीं दे पाते हालांकि समय मिलने पर वह मरीजों को देखने से नहीं चूकते। डा. शोभनाथ निदेशक उपचार के साथ जिला चिकित्सालय लखनऊ बलरामपुर अस्पताल के निदेशक भी हैं। उनका कहना है कि एक चिकित्सक के लिए मरीजों से दूर रहना काफी बुरा होता है, क्योंकि डिग्री करते वक्त वह कसम खाता है कि वह मरीजों की तकलीफों को हर कीमत पर दूर करने का प्रयास करेगा, लेकिन प्रशासनिक पद पर आने के बाद वह अपने इस दायित्व को पूरा नहीं कर पाता।
डा. नाथ ने 1977 में एमबीबीएस किया जिसके बाद कार्डियोलॉजी में डिप्लोमा। इसी बीच 1979 में उन्हें वकील के रूप में एक जीवनसंगिनी मिल गई। किसी डाक्टर से शादी क्यों नहीं की इस सवाल के जवाब में वे हंसते हुए कहते हैं कि उस दौर में उन्हें कोई डाक्टर मिली ही नहीं। सरकारी नौकरी में लम्बा समय बिताने के बाद अब वे इस नौकरी से अधिक खुश नजर नहीं आते। विनम्र स्वभाव के डा. शोभ नाथ से उनके सहयोगी काफी खुश रहते हैं, हालांकि उनके करीब रहने वाले कई ऐसे भी हैं, जो उनके इस स्वभाव का लाभ उठाने से नहीं चूकते।
हर पल अपने चिकित्सालय की फिक्र करते डा. शोभनाथ कभी-कभी रात के वक्त भी चिकित्सालय के राउण्ड पर निकल पड़ते हैं। डा. शोभ नाथ का कहना है कि रिटायरमेंट के बाद वे प्लेसमेंट एजेंसी खोलेंगे, ताकि प्रदेश की बेरोजगारी को कम करने में कुछ योगदान दे सकें।
कॉलेज लाइफ के बारे में उनका कहना है कि उन्होंने दोस्तों के साथ आखिरी फिल्म नई उमर की नई फसल देखी थी, जो आज भी उन्हें याद है। फिल्म का कारवां गुजर गया गुबार देखते रहे गीत उन्हें अपनी जिन्दगी का ही एक हिस्सा लगता। जिन्दगी के हसीन पलों के बारे में उनका कहना है कि वे उस वक्त सबसे खुश होते हैं जब वे पत्नी व अपनी बेटी निधि के साथ होते हैं। डा. शोभनाथ का कहना है कि नौकरी में आने के बाद निजी जिन्दगी जैसे खत्म सी हो गयी है।
उन्हें इस बात का अफसोस रहता है कि वे परिवार को अधिक समय नहीं दे पाते। डा. शोभनाथ सवेरे उठकर दैनिक कार्यों को निपटाकर कार्यालय भागते हैं। चिकित्सक होने के नाते उन्हें चिकित्सालय सवेरे ही पहुंचना होता है फिर फाइलों के बीच वे खो जाते हैं। अधिकांश दिनों में उनका नाश्ता व लंच चिकित्सालय में हो जाता है। हालांकि उन्हें इस बात की खुशी है कि उन्होंने अपनी बेटी को डॉक्टर बनाया जो एक निजी चिकित्सालय में गाइनोकोलॉजिस्ट के तौर पर कार्य कर रही हैं। जबकि बेटा मुंबई में प्रोडक्शन के क्षेत्र में कार्य करता है। डा. शोभनाथ का कहना है कि एक वक्त था जब वे एक दिन में 400 मरीजों को देखा करते थे, लेकिन आज यह संख्या आधा दर्जन तक भी बमुश्किल पहुंच पाती है। उनके रिटारमेंट में दस माह का समय है और उनका प्रयास है कि इस समय में वह बलरामपुर चिकित्सालय के लिए कुछ ऐसा कर जाएं जिसे उनके जाने के बाद लोग याद रखें।
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