चंद्रकांता के तिलिस्‍मी किले में पुलिस के कदमों की गूंज

Chandrakanta
लखनऊ। महोबा के वीरों आल्हा व ऊदल की लोक कथाओं से लेकर टेलीविजन धारावाहिक चन्द्रकांता तक तिलिस्‍म व रोमांच का पर्याय रहे चुनारगढ़ के किले को लोग देखने से महरूम हैं। प्रदेश के मिर्जापुर जिले में बने चुनारगढ़ के किले में पुलिस प्रशिक्षण केन्द्र चल रहा है। पुलिस कर्मियों को किले की चहारदीवारी के भीतर प्रशिक्षण तो मिल रहा है लेकिन उनके कदमों की धमक से यह जर्जर किला कब धराशाही हो जाएगा यह कोई नहीं जानता।

चुनारगढ़ का किला जिसके बारे में लोगों ने सिर्फ किताबों में पढ़ा है या फिर धारावाहिक में देखा। क्या वास्तव में किले के भीतर वह सबकुछ होता होगा जिसे वे टेलीविजन स्क्रीन पर देख रहे हैं? क्या हाथों के एक इशारे से किले की दीवार खिसक जाती होगी या फिर ताली बजाने से पैर के नीचे की फर्श से आग निकलने लगती होगी?

इन प्रश्नों के उत्तर तो वह किला ही दे सकता है जिसके बारे में लोग तरह-तरह की बातें करते हैं। राजा विक्रमादित्य ने यह किला अपने बड़े भाई भर्तहरी के लिए बनवाया था। किले में उनकी समाधि आज भी विद्यमान है। वीर रणबांकुरे आल्हा का विवाह सालवा के साथ इसी किले में हुआ। किले में सालवा मण्डप के अवशेष मौजूद है। विन्ध्य पर्वत के ऊपर स्थित इस किले के साथ कई रहस्यमय कहानियां जुड़ी हुई हैं। किले को प्रसिद्धि उस वक्त मिली जब हिन्दी उपन्यासकार देवकीनन्दन खत्री ने चन्द्रकांता पुस्तक में इस किले के तिलिस्म के बारे में लिखा।

इतिहासकार कहते हैं कि उत्तर भारत पर शासन करने वाले प्रत्येक शासक के मन में यह इच्छा हमेशा रही कि वे किले पर कब्जा जमाएं क्योंकि किला सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण था। मुस्लिम शासक शुआउद्दौला ने किले पर शासन किया जिसके बाद अंग्रेजों ने इसे हथिया लिया। देश की आजादी के बाद यूपी सरकार ने किले को सरकारी सम्पत्ति घोषित कर लिया जिसके बाद किले के राज व तिलस्म किले में ही दब कर रहे गए।

इतिहासकार बताते हैं कि किले के भीतर आज भी कई ऐसे राज दफन हैं जिन्हें खोजा जाए तो बहुत कुछ सामने आ सकता है। आजादी के बाद किले के कई द्वार बंद कर दिए गये। किले में कई ऐसी सुरंगे भी हैं जो उत्तर भारत के तमाम हिस्सों को किले से जोड़ती हैं। मिर्जापुर के लोग कहते हैं कि किले का तिलस्म व रहस्य आज भी बरकरार है जिस कारण वहां आम लोगों को जाना प्रतिबन्धित हैं। हालांकि सरकार तंत्र इस बात को नहीं मानता। प्रशासन का कहना है कि किले में पुलिस प्रशिक्षण केन्द्र होने के कारण आम लोगों को भीतर प्रवेश की इजाजत नहीं है।

मिर्जापुर के इतिहास पर नजर डालें तो पता चलता है कि उज्जैन के प्रसिद्ध सम्राट विक्रमादित्य के पश्चात् किले पर 1141 से 1191 तक प्रथ्वीराज चौहान का कब्जा रहा। उसके बाद शहाबुद्दीन गोरी 1198 में किले पर कब्जा कर लिया और लम्बे समय तक उसने उसके वंशजो ने राज किया। वर्श 1333 में स्वामीराज नाम के राजा ने किले पर अपना हक जमाया।

इस क्रम में जौनपुर के मुहम्मदशाह शर्की ने 1445 में तथा सिकन्दरशाह लोधी ने 1512 में किले पर अपना आधिपत्य साबित किया। इस वक्त तक तो किले के हालात कुछ बेहतर थे। किले की खूबसूरती व मजबूत बुर्ज आदि मौजूद थे लेकिन इससे बाद से ही किले की दुर्दशा शुरू हुई। 1529 में बाबर तथा 1530 में शेरशाहसूरी ने किले पर हक जमाया। लेखक अबुलफजल ने आईने अकबरी में किले की प्राचीनता व रहस्तय को काफी हद तक सहेजने का कार्य किया। फजल ने किले को चन्नार नाम से सम्बोधित किया है।

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