गर्मी पर हावी राजनीतिक सरगर्मी

गर्मी पर हावी राजनीतिक सरगर्मी
रामदत्त त्रिपाठी

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बीबीसी संवाददाता, उत्तर प्रदेश

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राहुल गांधी के लिए सबसे बड़ी चुनौती उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में पार्टी को जीत दिलाना है. जेठ महीना शुरू होने को है. मौसम गर्म है. लू चल रही है. बाहर निकलने का मन नही करता. लेकिन इस गर्मी का कोई असर उत्तर प्रदेश की राजनीति पर नही है. विधान सभा का कार्यकाल पूरे एक साल बाक़ी है. लेकिन सारी पार्टियों ने ऐसा टेम्पो बना दिया है जैसे उत्तर प्रदेश में बस महीने दो महीने में विधान सभा चुनाव होने वाले हैं.

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सबसे सुकुमार और मायावती की ओर से 'युवराज" के नाम से संबोधित कांग्रेस के युवा नेता गर्मी और सुरक्षा दोनों की परवाह किए बिना भट्टा परसौल में दिन भर धरने पर बैठे. राहुल गांधी ज़मीन अधिग्रहण में भ्रष्टाचार और निर्दोष नागरिकों पर कथित पुलिस अत्याचार का मामला प्रधानमंत्री तक पहुंचा आए हैं.

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कुछ ही रोज़ पहले वह प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह को लेकर बांदा में एक बड़ी रैली कर चुके हैं. राहुल गांधी अगले दो दिनों तक बनारस में उत्तर प्रदेश कांग्रेस के सम्मेलन में शिरकत करेंगे. फिर वहीं बनारस के बेनिया बाग़ मैदान में सोनिया गांधी जन सभा में कांग्रेस की रैली में माया सरकार के ख़िलाफ़ बेटे द्वारा छेड़े गए अभियान को आगे बढाएंगी.

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राहुल गांधी का पीछा करते हुए भारतीय जनता पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राजनाथ सिंह भट्टा परसौल के मुद्दे पर अपने संसदीय क्षेत्र गाज़ियाबाद में गिरफ़्तारी दे चुके हैं. भाजपा ने भी तैयारियां शूरु कर दी है. पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी राज्य में कई सभाएं कर चुके हैं.

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भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी हाल ही में उत्तर प्रदेश में कई सभाएं कर चुके हैं. भाजपा मायावती के ख़िलाफ़ आरोपों का पुलिंदा पुस्तक के रूप में छापकर बाँट रही है. संभवतः जातीय संतुलन के हिसाब से से भाजपा ने कलराज मिश्र को चुनाव अभियान की कमान थमा दी है. प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही राज्य के किसी भी कोने में होने वाली किसी बड़ी घटना पर सबसे पहले पहुँच जाते हैं.

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भाजपा ने भूमि अधिग्रहण से प्रभावित हर गाँव में किसान पंचायत का ऐलान कर दिया है. भाजपा ने 'मीडिया मैनेजमेंट' अभी से इतना तेज़ कर दिया है कि लगभग हर रोज़ कोई न कोई बड़ा नेता पार्टी ऑफ़िस में प्रेस कांफ्रेंस के लिए बुलाया जाता है.

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वह पोलिंग बूथ स्तर पर विजय वाहिनी गठित करने जा रही है. भाजपा और कांग्रेस दोनों ही सवर्ण और मध्यम वर्गीय मतदाताओं पर निगाह गड़ाए हैं , वही कांग्रेस ने मुस्लिम और दलित समुदायों को भी अपने एजेंडे पर ले रखा है. लेकिन ज़मीनी लड़ाई और चुनावी तैयारियों के मामले में समाजवादी पार्टी, भाजपा और कांग्रेस से कहीं आगे दिखती है.

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तैयारियों के मामले सपा फ़िलहाल सबसे आगे दिखती है. सपा ने विधान सभा की लगभग तीन चौथाई सीटों पर अपने उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं और चुनाव क्षेत्रों में उनकी गतिविधियों पर नज़र रखी जा रही है. चुनाव प्रबंधन के लिए सपा भी पोलिंग बूथ तक अपनी मशीनरी ठीक कर रही है.

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समाजवादी पार्टी ने विधान सभा के अंदर और बाहर दोनों जगह माया सरकार की नाक में दम कर रखा है. सपा ने मार्च महीने में तीन दिनों तक पूरे प्रदेश में राज्य सरकार के ख़िलाफ़ सड़कों पर संघर्ष किया था. पार्टी मशीनरी को चुस्त दुरूस्त करने के लिए समाजवादी पार्टी सात-आठ जून को आगरा में राष्ट्रीय सम्मलेन करने जा रही है.

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मुलायम सिंह यादव ने विशेषकर पत्थरों के स्मारकों और मायावती की अपनी मूर्तियाँ लगाने का मामला उठाया है. सपा मायावती सरकार के साथ-साथ महंगाई जैसे मुद्दे पर केंद्र की कॉंग्रेस सरकार पर भी हमले बोल रही है. सपा वह हर मुद्दा लपक रही है , जिससे मुस्लिम समुदाय का विश्वास वापस मिले और अल्पसंख्यक समुदाय कॉंग्रेस की तरफ़ न जाए.

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सपा की इस कोशिश को नाकाम करने के लिए कॉंग्रेस की ओर से दिग्विजय सिंह कुछ न कुछ करते रहते हैं जिससे मुस्लिम समुदाय छह दिसंबर 1992 और बटला कांड जैसे मुद्दे भूल जाए.

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चुनाव की तैयारियों के मामले में मुख्यमंत्री मायावती सपा से पीछे नही हैं. बहुजन समाज पार्टी ने भी बड़ी तादाद में सीटों पर अपने उम्मीदवारों को हरी झंडी दे दी है. बसपा भी किसी से पिछे नहीं है. मायावती की मुश्किलें ज़रूर बढ़ी हैं लेकिन तैयारी उनकी भी मुकम्मल है.

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किसी न किसी बहाने से सरकारी ख़र्चे से बड़े बड़े विज्ञापन अख़बारों और टीवी चैनलों को दिए जा रहे हैं. संभवतः उनको इस बात का एहसास है कि पिछले चुनाव में मुलायम सिंह यादव को अपदस्थ करने के लिए उन्हें ऊँची जातियों और मध्यम वर्ग के जो बोनस वोट मिले थे , अब वे उनसे छिटक गए हैं.

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इसलिए माया सरकार पिछले कई महीनों से अपना ध्यान उन योजनाओं पर केंद्रित कर रही है, जिनका लाभ सीधे तौर पर गाँवों और शहरों की दलित बहुल बस्तियों में रहने वाले और ग़रीब तबक़ों को मिले जो उनके परम्परागत मतदाता हैं. लेकिन मायावती की मुसीबत यह है कि इस बार वह वहाँ खड़ी होकर चौतरफ़ा हमले झेल रही हैं, जहाँ 2007 में मुलायम सिंह यादव खड़े थे.

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निजी कंपनी के लिए भूमि अधिग्रहण, भ्रष्टाचार और अपराधों के लिए पिछली बार मुलायम सिंह यादव को सफ़ाई देनी पड़ रही थी, इस बार मायावती को. पिछली बार कॉंग्रेस और भाजपा भीतर भीतर से मायावती की मदद कर रहे थे, इस बार ये दोनों भी उन पर हमलावर हैं.

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2007 में मुख्यमंत्री बनने के बाद मायावती का ग्राफ़ और ऊपर चढ़ा था. वह प्रधानमंत्री के लिए मज़बूत दावेदार बनीं और उनकी तुलना राष्ट्रपति बराक ओबामा से की जाने लगी. लेकिन इन चार सालों में मायावती ने सत्ता का केंद्रीकरण किया. उन्होंने अंबेडकर और कांशी राम की मूर्तियां भले लगाई, लेकिन वंचित लोगों को सत्ता में भागीदारी का वादा भूल गईं.

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शायद इन्हीं सब बातों से लोगों का ध्यान हटाने के लिए बहुजन समाज पार्टी 31 मई को पेट्रोल के मूल्य में बढ़ोतरी और मंहगाई के मुद्दे पर प्रदेश व्यापी आंदोलन करेगीं जिसकी कमान स्वयं मायावती संभालेंगी.

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