होली पर याद करें होलिका की कहानी और संदेश

नई दिल्ली | होली का पर्व आते ही रंग और गुलाल की आभा गालों पर खुद ब खुद खिल जाती है। साल 2011 की होली इस बार मार्च महीने की 19-20 तारीख पर पढ़ रही है। शनिवार और रविवार के दिन होली के त्योहार मजा दोगुना ही हो गया है। वैसे नौकरीपेशा लोगों को जरूर मलाल है कि होली के इस बार हफ्ते के आखिर में पढ़ने से उन्हे वर्किंग डे में छुट्टी नहीं मिल पाई। शनिवार यानी होलिका दहन का उत्सव है और कल मतलब रविवार को लोग रंग खेल कर अपनी खुशी का इजहार करेंगे।

होली का पर्व मनाने के पीछे कथा बहुत पुरानी है लेकिन आज के समय में भी उतनी ही प्रांसगिक है जितने पहले हुआ करती थी। वैसे तो सारे धर्मों के सभी पर्व सद्भाव और आपसी मेल-जोल के उद्देश्य से बनाए गए हैं। लेकिन फिर भी सभी पर्वों के पीछे एक विशेष प्रेरक प्रसंग होता है। होली का त्योहार राक्षसराज हिरण्यकश्यप के गुरूर को तोड़ने और उसके पुत्र भक्त प्रह्लाद की आश्था के जीतने की कहानी याद दिलाता है। होली पर हिरण्यकश्यप की बहन होलिका भक्त प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठ गई थी, उसे वरदान प्राप्त था कि आग उसे जला नहीं सकती लेकिन अधर्म का साथ देने की वजह से होलिका जल गई और भक्त प्रह्लाद बच गए।

हिरण्यकश्यप को उसके पापों की सजा देने के लिए और उसका अंत करने के लिए भगवान स्वयं नृसिंह अवतार के रूप में पृथ्वी पर उतरे और अपने नखों से उसका पेट चीर कर उसका वध कर दिया। भगवान के हाथों मरने की वजह से राक्षस हिरण्यकश्यप को स्वर्ग की प्राप्ति हुई जबकि भक्त प्रह्लाद की आस्था और विश्वास की जीत ने अधर्म के ऊपर धर्म की एक बार फिर स्थापना हो गई।

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