भाजपा तिरंगा कश्मीर की जगह दंतेवाड़ा में भी तो फहरा सकती है!
नई दिल्ली। पिछली गर्मी से सुलगती घाटी बड़ी मुश्किल से शांत हुई है। लेकिन लोगों के घाव अभी भी हरे है, इसलिए उन्हें वक्त और आराम चाहिए ये कहना है जम्मू -कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला का। जो भाजपा को कश्मीर में तिरंगा फहराने से रोक रहे हैं, और भाजपा है कि जिस ने श्रीनगर के लाल चौक पर गणतंत्र दिवस (26 जनवरी) पर तिरंगा फहराने के लिए कोलकाता से 12 जनवरी को तिरंगा यात्रा शुरू की है।
भाजपा केंद्र सरकार के घाटी में शांति लाने के प्रयासों को अलगाववादी ताकतों के साथ समझौता मानकर पुरजोर तरीके से विरोध करना चाहती है। लेकिन क्या भाजपा से हम ये पूछ सकते हैं कि आखिर वो ये क्रांतिकारी कदम क्यों उठाना चाहती है?भाजपा तो उस पार्टी का नाम है जो ये कहती है कि वो उसूलों, सिद्धातों और विद्वानों की पार्टी है।
तो कोई इन विद्वानों से पूछे कि ये किस किताब में लिखा है कि घायल शेर को छेड़ा जाये? क्योंकि घायल शेर को छेड़ने का मतलब है मौत को दावत देना। कश्मीर की भी हालत इस समय एक घायल शेर की ही तरह है, ऐसे में अगर उसे छेड़ा जाता है तो तबाही का मंजर दोबारा शुरू हो सकता है। जिसे संभालना वाकई में बेहद मुश्किल होगा।
भाजपा ये भंलि-भांति जानती है , लेकिन फिर भी वो ऐसा करने जा रही रही है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक देश को एक बताने वाली भाजपा अगर वाकई में तिरंगा लेकर ये कहना चाहती है कि वो धर्म की राजनीति नहीं करती है तो कश्मीर के बजाय दंतेवाड़ा क्यों नहीं जाती, जहां सैकड़ों जवानों की चिताएं जली है?
क्या वो देश के सपूत नहीं थे? अगर बीजेपी, केन्द्र सरकार को नीचा दिखाना चाहती है तो दंतेवाड़ा से वो बेहतरीन शुरूआत कर सकती है लेकिन नहीं वो कश्मीर जा रही है, क्योंकि वो जानती है कि वहां जाकर हालात में परिवर्तन होगा जिससे वो राजनैतिक फायदे के रूप में प्रयोग कर सकती है।
क्या सूरत ये नहीं बता रही है कि भाजपा तिंरगे पर राजनीति कर रही है, एक मशहूर कवि की रचना है कि तर्ज पर भाजपा इन दिनों कह रही है कि ...हंगामा करना मेरा मकसद नहीं...लेकिन वो भली-भांति जानती है कि लाल चौक पर तिंरगा फहराने से ...हंगामा जरूर बरपेगा।अगर ऐसा नहीं है तो क्यों कश्मीर जा रही है, दंतेवाड़ा नहीं?
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