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उल्लू अशुभ नहीं, हरिद्वार में होती है इसकी पूजा

देहरादून। कहा जाता है कि दीपावली की रात उल्लू के लिए काली रात होती है। अवधाराणाओं के अनुसार उल्लू को या तो अशुभ माना जाता है या कुछ लोग दीपावली के दिन उसकी बलि चढ़ाते हैं, लेकिन तीर्थनगरी हरिद्वार में लक्ष्मी की सवारी उल्लू की पूजा होती है।

गंगासभा के अध्यक्ष राम कुमार मिश्रा ने आईएएनएस को बताया कि उल्लू को पूजे बिना भक्त पर लक्ष्मी की कृपा नहीं होती है। उन्होंने कहा कि उल्लू लक्ष्मी की सवारी है और धन-धान्य की प्राप्ति के लिए उल्लू की पूजा की जाती है। उल्लू किसी के लिए अशुभ नहीं होता।

मिश्रा ने बताया कि हरिद्वार में गौतम गोत्र के वंशजों द्वारा उल्लू पूजन की परम्परा लम्बे अरसे से चली आ रही है। उन्होंने कहा कि ऐसा करके ये लोग उल्लू के संरक्षण का संदेश देते हैं। उन्होंने बताया कि गौतम गोत्र के लोग उल्लू के दर्शन को शुभ मानते हैं। गंगासभा अध्यक्ष के अनुसार उल्लू को बंधक बनाकर पूजा करना उचित नहीं है। यदि वह अपने आप मिल जाए तो पूजा करनी चाहिए या उसके प्रतीक स्वरूप लकड़ी या अन्य धातु से बने यंत्र की पूजा करनी चाहिए।

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आचार्य चंद्रकांत द्विवेदी का कहना है कि उल्लू अशुभ नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि जो पक्षी मां लक्ष्मी का वाहन है, वह अशुभ कैसे हो सकता है। उन्होंने कहा कि गौतम गोत्र के वंशजों को इस परम्परा का विस्तार करना चाहिए।

गौरतलब है कि हिन्दू मान्यताओं के अनुसार गौतम ऋषि ने तीर्थनगरी में उलूक तंत्र की सरंचना की थी। मान्यता है कि यहां राजा दक्ष ने यज्ञ किया था, जिसमें उन्होंने भगवान शिव को नहीं बुलाया था। सनद रहे कि इस यज्ञ को गौतम वंश के पुरोहितों ने किया था। शिव की उपेक्षा पर भगवान विष्णु भी क्रोधित हुए थे। विष्णु ने समस्त ब्राह्मणों को विद्याविहीन होने का श्राप दे दिया। इससे नाराज होकर भृगु ऋषि ने विष्णु की छाती पर पांव रख दिया। यह देखकर लक्ष्मी ने ब्राह्मणों को धन-धान्य से विमुख होने का अभिशाप दे दिया।

मान्यता है कि इस अभिशाप से बचाने के लिए गौतम ऋषि ने तीर्थनगरी में उलूक तंत्र बनाया। अपने वाहन का तंत्र बनने से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु एवं लक्ष्मी दोनों ने ब्राह्मणों को उस अभिशाप से मुक्त किया था। तब से गौतम गोत्र के वंशज दीपावली पर उल्लू की विशेष पूजा करते हैं। हरिद्वार में यह पंरपरा आज भी जारी है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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