पटना का 'बच्चा बैंक'

सुहैल मंसूरी
पटना से बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
पाँच सौ बच्चों वाले इस बैंक में अबतक सदस्यों के ढेढ़ लाख रूपये जमा हो चुके हैं
पंद्रह वर्षीय इंद्रजीत ने जब ‘बच्चा बैंक' से दो सौ रुपये निकालकर बीमार माँ का इलाज करवाया तो उन्हें विश्वास हुआ कि अगर उन्होंने पैसे पैसे बचाकर खाते में नहीं जमा किए होते तो माँ का इलाज नहीं हो पाता.
‘बच्चा बैंक', ग़रीब बच्चों की एक सामूहिक गुल्लक है जिसमें पटना के झुग्गी-झोपड़ी इलाक़ों के पाँच सौ से ज़्यादा बच्चे अपनी बचत के पाँच-दस रुपए जमा करते हैं और इन पैसों को किताब- क़लम के अलावा अपनी आकस्मिक ज़रूरतों के लिए इस्तेमाल करते हैं.
यह बैंक बिहार सरकार के मानव संसाधन विकास विभाग की संस्था बालभवन किलकारी के ज़रिए संचालित होता है.
इस अलग तरह के बैंक की शुरूआत पिछले साल की गई थी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इसका उदघाटन किया था.
मानव संसाधन विकास विभाग के प्रधान सचिव अंजनी कुमार सिंह कहते हैं, "झुग्गी-झोपड़ी इलाक़ों के प्रतिभासंपन्न बच्चों की योग्यता को निखारने, उनमें बचत की आदत डालने और पैसे और संस्था के प्रबंधन के गुणों को विकसित करने के मक़सद के लिए हमने ‘बच्चा बैंक' की शुरूआत की है".
खास बात यह है कि इस बैंक का प्रबंधन और संचालन भी बच्चे ख़ुद करते हैं.
जमा किए गए पैसों को स्थानीय भारतीय स्टेट बैंक के खाते में जमा कराया जाता है.
‘बच्चा बैंक' के प्रबंधक 14 वर्षीय नवीन कुमार हैं. उन्हें बैंक से पाँच सौ रुपए तन्ख्वाह मिलती है. इसी उम्र की नेहा उपप्रंबधक की ज़िम्मेदारी निभाती हैं और उनका मेहनताना तीन सौ रुपए है.
नवीन कहते हैं, "शुरू में हमें काफी झिझक होती थी लेकिन इस काम में लगने के बाद हममें जवाबदेही का एक एहसास पैदा हुआ है और मेरा आत्मविश्वास भी काफ़ी बढ़ गया है".
नेहा कहती हैं, "हम एक टीम भावना से काम करते हैं और धीरे-धीरे महसूस होने लगा है कि हमारे अंदर नेतृत्व क्षमता विकसित हो रही है".
अभी तक ‘बच्चा बैंक' में डेढ़ लाख रुपए जमा हो चुके हैं.
हर बच्चे की अपनी पासबुक है जिसपर खाताधारी की तस्वीर और पता भी दर्ज हैं.
खाते में पैसे जमा कराने आये सोलह वर्षीय गौतम कहते हैं, "ये रुपए (30 रुपये) मेरी माँ ने मुझे दिए हैं. चूँकि एक बार में ज़रूरत भर पैसे उनके पास भी नहीं होते इसलिए हम थोड़ा-थोड़ा जमा कर अपनी किताब, कापी वगैरह से बचा लेते हैं".












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