चिकित्सा नोबेल से वेटिकन नाराज

चिकित्सा नोबेल से वेटिकन नाराज़
आईवीएफ़ तकनीक से अब तक लाखों बच्चे पैदा हो चुके हैं

कैथोलिक ईसाइयों की मुख्य संस्था वेटिकन ने टेस्ट ट्यूब तकनीक से बच्चे पैदा करने की शुरुआत करने वाले वैज्ञानिक प्रोफ़ेसर रॉबर्ट एडवर्ड को नोबेल पुरस्कार दिए जाने की निंदा की है.

वेटिकन के एक अधिकारी ने कहा है कि इन विट्रो फ़र्टिलाइज़ेशन (आईवीएफ़) तकनीक विकसित करने वाले ब्रिटिश चिकित्सा वैज्ञानिक को नोबेल पुरस्कार देना 'एकदम अनुचित' है.

'पॉन्टिफ़िकल एकैडमी फ़ॉर लाइफ़' के प्रमुख इग्नेशियो कैरेस्को डी पाउला का कहना है कि पुरस्कार देते समय फ़र्टिलिटी के इलाज में नैतिकता के सवालों को अनदेखा किया गया.

उनका कहना है कि आईवीफ़ प्रक्रिया में बड़ी संख्या में मानव भ्रूण नष्ट हो जाते हैं. 1978 से अब तक दुनिया भर में आईवीएफ़ तकनीक से क़रीब 40 लाख बच्चे पैदा हो चुके हैं. जैव नैतिकता मामलों के लिए वेटिकन के प्रवक्ता कैरेस्को ने कहा है कि आईवीएफ़ मानव प्रजनन के क्षेत्र में एक नया और महत्वपूर्ण अध्याय है.

उनका कहना है कि लेकिन नोबेल पुरस्कार समिति की ओर से प्रोफ़ेसर एडवर्ड को चुना जाना एकदम अनुचित है क्योंकि अगर यह चिकित्सा पद्धति नहीं होती तो मानव शुक्राणु के लिए बाज़ार नहीं बनता और दुनिया भर में बड़ी संख्या में फ़्रीज़र मानव भ्रूण से भरे हुए नहीं होते.

इटली के समाचार एजेंसी एन्सा से उन्होंने कहा, "सबसे अच्छे मामलों में इन भ्रूण को बच्चेदानी में स्थापित कर दिया जाता है लेकिन ज़्यादातर मामलों में वे या तो नष्ट कर दिए जाते हैं या फिर उनकी मौत हो जाती है. ये ऐसी समस्या है जिसके लिए नोबेल पुरस्कार के नए विजेता ज़िम्मेदार हैं."

हालांकि ये टिप्पणी करते हुए कैरेस्को ने कहा कि वे व्यक्तिगत हैसियत से यह कह रहे हैं. लेकिन चिकित्सा के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार विजेताओं का चयन करने वाली समिति ने कहा है कि प्रोफ़ेसर एडवर्ड के काम ने पूरी दुनिया में लोगों को बच्चा पाने की ख़ुशी दी है.

समिति ने कहा है, "बांझपन एक ऐसी चिकित्सकीय परिस्थिति है, जिससे दुनिया में लगभग 10 प्रतिशत दंपति प्रभावित होते हैं. प्रोफ़ेसर एडवर्ड की उपलब्धि ने उनके लिए इलाज संभव किया है."

रॉबर्ट एडवर्ड ने निस्संतान लोगों की मदद के लिए इन विट्रो फ़र्टिलाइज़ेशन (आईवीएफ़) तकनीक का विकास किया. उन्होंने अपना शोध 50 साल पहले शुरू किया था.

1950, 1960 और 1970 के दशक में उन्होंने जो प्रयास किए, उसके परिणामस्वरूप विश्व का पहला टेस्ट ट्यूब बेबी 1978 की जुलाई में पैदा हुआ. ये एक लड़की थी और उसका नाम लुई ब्राउन था. प्रोफ़सर एडवर्ड 85 वर्ष के हैं और इस समय बीमार हैं.

उस शोध की सफलता का ही परिणाम है कि आज आईवीएफ़ तकनीक से गर्भ धारण करने वाले हर पाँच दंपति में से एक अपने प्रयास में सफल होता है.

सामान्य तरीके से बच्चा पैदा करने के तरीके में भी सफलता की दर यही है. प्रोफ़सर एडवर्ड के सहयोगी पैट्रिक स्टेपटो ने इस शोध में उनका साथ दिया और इनके प्रयासों को चर्च और कई सरकारों का विरोध भी झेलना पड़ा था.

विज्ञान के क्षेत्र के उनके कई सहयोगियों को भी इस शोध की सफलता को लेकर शक था और स्थिति ये हो गई थी कि अपना शोध करने के लिए उन्हें पैसों की भी कमी पड़ी जिसके लिए उन्हें निजी सहायता राशि पर निर्भर रहना पड़ा.

इन विट्रो फ़र्टिलाइज़ेशन (आईवीएफ़) एक ऐसी तकनीक है जिसके तहत उन दंपतियों का इलाज होता है जो संतान को जन्म दे पाने में या तो असमर्थ होते हैं या फिर जिन्हें संतानोत्पत्ति में दिक़्कत होती है.

आईवीएफ़ के अंतर्गत महिला के अंडाणु (ऐग सेल) और पुरूष के शुक्राणु (स्पर्म) को शरीर के बाहर, एक टेस्ट ट्यूब या किसी बीकर में निषेचित यानि फ़र्टिलाइज़ किया जाता है.

उसके बाद इस फ़र्टिलाइज़्ड अंडे (ज़ाइगोट) को महिला के बच्चेदानी (यूट्रस) में स्थापित किया जाता है, इस उम्मीद के साथ कि नौ महीने बाद एक स्वस्थ शिशु पैदा होगा.

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