विवादित स्थल राम जन्मभूमि: हाई कोर्ट

रामदत्त त्रिपाठी
बीबीसी संवाददाता, लखनऊ
अयोध्या में सुरक्षा के काफ़ी कड़े इंतज़ाम किए गए हैं.
एक ऐतिहासिक फ़ैसले में इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने अयोध्या के विवादित स्थल को राम जन्मभूमि घोषित किया है.
हाईकोर्ट ने बहुमत से फ़ैसला किया है कि विवादित भूमि जिसे रामजन्मभूमि माना जाता रहा है, उसे हिंदू गुटों को दे दिया जाए. वहाँ से रामलला की प्रतिमा को नहीं हटाया जाएगा.
लेकिन अदालत ने यह भी पाया कि चूंकि कुछ हिस्सों पर, जिसमें सीता रसोई और राम चबूतरा शामिल है, निर्मोही अखाड़े का भी कब्ज़ा रहा है इसलिए यह हिस्सा निर्माही अखाड़े के पास ही रहेगा.
अदालत के दो जजों ने यह फ़ैसला भी दिया है कि इस भूमि के कुछ हिस्सों पर मुसलमान प्रार्थना करते रहे हैं इसलिए ज़मीन का एक तिहाई हिस्सा मुसलमान गुटों दे दिया जाए.
लेकिन तीन महीनों स्थिति में कोई बदलाव नहीं की जाएगी और कोई भी कदम ज़मीन के बंटवारे के बाद ही कोई आगे की कार्रवाई होगी.
अदालत ने दो एक के फ़ैसले से सुन्नी वक्फ़ बोर्ड के मुकदमे को खारिज कर दिया.
उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की है.
फ़ैसले के बाद इस विवाद के पहले याचिकाकर्ता, 90 साल के हाशिम अंसारी ने कहा: "मैं इस फ़ैसले का इस्तक़बाल करता हूं और इस फ़ैसले से बाबरी मस्जिद के नाम पर चल रहा राजनीतिक अखाड़ा बंद होगा."
उत्तरप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने फ़ैसले का स्वागत किया लेकिन साथ ही कहा कि अगर ज़मीन का बंटवारा नहीं होता तो अच्छा होता.
उनका कहना था, "मेरे अनुसार अदालत ने ये ज़मीन मुस्लिम वक्फ़ बोर्ड को दान में दिया है."
वहीं मुस्लिम वक्फ़ बोर्ड के वकील जफ़रयाब जिलानी ने कहा है कि वो इस फ़ैसले से "कुछ हद तक निराश हैं". उन्होंने कहा कि फ़ैसले का अच्छी तरह से अध्ययन करने के बाद वो सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाएंगे.
उनका कहना था, "फ़ैसले पर मायूस होने की ज़रूरत नहीं है और सड़कों पर उतरने की ज़रूरत नहीं है. दो जजों ने माना है कि वहां मस्जिद थी लेकिन उसके बनने के तरीके पर सवाल उठाए गए हैं और इसलिए हम सुप्रीम कोर्ट जाएंगे."
विश्व हिंदू परिषद के सरसंघ चालक मोहन भागवत ने कहा है कि इस फ़ैसले को किसी के विजय या पराजय के रुप में नहीं देखा जाना चाहिए.
उनका कहना है कि अब राष्ट्रीय मूल्यों के प्रतीक के रुप में राम मंदिर का निर्माण होना चाहिए न कि किसी देवी-देवता के प्रतीक के रुप में.
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और गृहमंत्री पी चिदंबरम ने सभी पक्षों से शांति बनाए रखने की अपील की है.
सुरक्षा व्यवस्था भी काफ़ी कड़ी रखी गई है.
ये फ़ैसला पहले 24 सितंबर को आना था लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे रोकने के लिए दाखिल याचिका पर सुनवाई की और फ़ैसला टाल दिया. फिर 28 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने उस याचिका को खारिज करते हुए फ़ैसले के लिए 30 सितंबर की तारीख़ तय कर दी.
इस मामले की सुनवाई कर रही तीन जजों की बेंच में से एक, धर्मवीर शर्मा, एक अक्तूबर को सेवानिवृत्त हो रहे हैं और यदि वो फ़ैसला उससे पहले नहीं सुना पाते तो पूरे मामले की सुनवाई फिर से करनी पड़ती.
अयोध्या में विवादित जमीन के मालिकाना हक के चार मामलों की सुनवाई करने वाली हाईकोर्ट की विशेष पीठ पिछले 21 साल में 13 बार बदल चुकी है.
बेंच में यह बदलाव जजों के रिटायर होने, पदोन्नति या तबादले के कारण करने पड़े.
भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में यह न केवल साठ साल तक यानि सबसे लंबा चलने वाला, बल्कि एक ऐसा विवाद है, जिसके चलते देश में कई बार राजनीतिक और सामाजिक उथल - पुथल हो चुकी है, क्योंकि यह मामला ज़मीन के एक छोटे से टुकड़े नहीं बल्कि हिंदू–मुस्लिम दोनों समुदायों की धार्मिक आस्थाओं और संविधान के मूल सिद्धांतों से जुड़ा है.
चारों मुकदमों में कुल मिलाकर लगभग तीस पक्षकार हैं, जिन्होंने न केवल मौखिक बल्कि दस्तावेजी सबूत, क़ानूनी, धार्मिक और साहित्यिक पुस्तकों से हज़ारों पन्नों के उद्धरण दिए हैं.
अदालत ने मामले की तह में जाने के लिए पहली बार पुरातत्व सर्वेक्षण से खुदाई करवाकर एक विशेषज्ञ रिपोर्ट भी प्राप्त कर ली, जिसमे कहा गया है कि ज़मीन के अंदर 11 वीं शताब्दी में उत्तर भारत में पाए जाने वाले मंदिरों जैसे विशिष्ट अवशेष मिले हैं












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