आज भी ताजे हैं जहरीली गैस के दिए जख्म

भोपाल, 27 सितम्बर (आईएएनएस)। भोपाल में 25 साल पहले हुई गैस त्रासदी का दंश आज भी यहां के लोग झेल रहे हैं। उनमें से कुछ लोगों की आंखों की रोशनी चली गई है तो कुछ के गुर्दे खराब हो चुके हैं। हालत यह है कि आज ये लोग तिल-तिल कर मरने को मजबूर हो गए हैं।

दो दशकों पहले हुई इस गैस त्रासदी के शिकार गुफरान खान (32) के दोनों आंखों की रोशनी चली गई है तो अकील खान (28) के दोनों गुर्दे खराब हो गए हैं। ये दोनों उन लोगों में शामिल हैं जिनकी जिंदगी को 25 साल पहले हुई भोपाल गैस त्रासदी ने नरक बना दिया था।

वर्ष 1984 में दो-तीन दिसम्बर की रात को यूनियन कार्बाइड कारखाने से रिसी जहरीली गैस ने हजारों लोग काल के मुंह में समा गए थे। जब यह हादसा हुआ था तब गुफरान महज छह वर्ष का था, तब उसका हंसता खेलता परिवार हुआ करता था।

कुछ समय बाद गुफरान की आंखों में जलन शुरू हुई और समय गुजरने के साथ ही उसकी आंखों की रोशनी भी कम होने लगी। रोशनी कम होने का सिलसिला जारी रहा और बाद में दोनों आंखों से दिखना ही बंद हो गया।

आंखों पर काला चश्मा पहने गुफरान बताते हैं कि आंखों की रोशनी क्या गई अपनों का साथ भी छूट गया। वह अविवाहित हैं अैार पांच रुपये प्रति किलो की दर से सुपारी काटकर जीवन चला रहा हैं। उन्हें गैस से मिली बीमारी ने अंधा बना दिया है और मुआवजे में आंखे खोने की कीमत सिर्फ 25 हजार रुपये ही मिले।

गुफरान के अलावा और लोग भी इस त्रासदी का दंश झेल रहे हैं। गोविंदपुरा इलाके में रहने वाले अकील खान को गैस ने गुर्दे का रेागी बना दिया। हालत यह है कि सप्ताह में तीन बार उन्हें डॉयलिसिस कराना होता है। लम्बी लड़ाई लड़ने के बाद गैस राहत अस्पताल में सप्ताह में दो बार डायलिसस होने लगा है। इसके बाद भी एक बार उन्हें निजी तैार पर डायलिसिस कराना पड़ता हैं। इस बीमारी के चलते उनका घर जमीन तक बिक गया है।

अकील ने उपचार कराने के लिए कई लोगों से कर्ज भी लिया है और अब हाल यह है कि डायलिसिस कराने के लिए रकम का इंतजाम करना काफी मुश्किल हो गया है। अकील उम्मीद पाले हुए हैं कि मुआवजे की राशि मिलने पर वह अपना कर्ज चुका सकेंगे।

गैस जनित बीमारियां अब अगली पीढी तक में पहुंच रही हैं। इसका उदाहरण है जेपी नगर में ंरहने वाले संजय यादव हैं, जिनके दो बेटे अमन (नौ) और विकास (11) शारीरिक तौर पर अपाहिज हो चुके हैं। दोनों बेटियां वंदना (सात) और योगिता (14) के अलावा पत्नी शारदा व मां ओमवती भी सांस की बीमारी से ग्रसित हैं। संजय बताते हैं कि उनकी कमाई का आधा हिस्सा परिवार के इलाज में ही खर्च हो जाता है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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