सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल की जम्मू में विभिन्न समूहों से मुलाकात (राउंडअप)
जम्मू, 21 सितम्बर (आईएएनएस)। जम्मू एवं कश्मीर के हालात का जायजा लेने पहुंचे सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल ने मंगलवार को यहां विभिन्न वर्ग के लोगों से मुलाकात की और आम आदमी की सरकार के खिलाफ शिकायतें और मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के इस्तीफे की मांग सुनी।
प्रतिनिधिमंडल के कुछ सदस्यों ने गिरफ्तार अलगाववादी नेता शबीर अहमद शाह से मुलाकात की और कश्मीरी पंडितों के एक शिविर का भी दौरा किया।
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की राज्य इकाई ने शिकायत की कि शासनाभाव एक समस्या है। भाजपा ने इसके लिए अब्दुल्ला के इस्तीफे की मांग की।
पार्टी के विधायक दल के नेता चमन लाल गुप्ता ने कहा कि राज्य में सरकार नाम की कोई चीज नहीं है।
डीएमके सांसद टी.आर.बालू के नेतृत्व में तीन सदस्यीय समूह ने सरकारी चिकित्सा महाविद्यालय एवं अस्पताल स्थित कर्नल चोपड़ा नर्सिग होम का दौरा किया, जहां शाह इलाज के लिए भर्ती हैं।
जम्मू एवं कश्मीर डेमोकेट्रिक फ्रीडम पार्टी के अध्यक्ष शाह को एक साल पहले सार्वजनिक सुरक्षा कानून के तहत गिरफ्तार किया गया था। शाह पर लोगों को भड़काने और शांति में खलल डालने का आरोप है। शाह को जम्मू के बाहर स्थित कोट भालवाल जेल में रखा गया है।
कश्मीर घाटी के अलगाववादी नेताओं की तरह शाह ने भी कश्मीरियों को अपना भविष्य तय करने के लिए आत्मनिर्णय के अधिकार की मांग रखी।
प्रतिनिधिमंडल ने शाह के साथ विचारों का आदान-प्रदान किया और उनके जल्द स्वस्थ होने की कामना की।
इसके अलावा मार्क्सवादी नेता सीताराम येचुरी के नेतृत्व में पांच सदस्यीय एक अन्य दल ने जम्मू के बाहर मुथी स्थित कश्मीरी पंडितों के एक शिविर का दौरा किया। इस दल ने प्रवासी कश्मीरी पंडितों के विचारों को सुना।
शिबना पंडिता नामक एक प्रवासी ने प्रतिनिधियों से कहा कि कश्मीरी हिंदू 1990 में जब से घाटी से जम्मू पलायन करके आए हैं, तभी से अमानवीय हालात में जी रहे हैं।
कश्मीरी प्रवासी महिलाओं ने कहा कि यद्यपि सरकार हमें सम्मान की जिंदगी मुहैया कराने का वादा करती रही है, लेकिन वह वादा पूरा नहीं हो पाया है।
पुष्पा नामक एक युवती ने कहा, "हमने घाटी में नौकरी के लिए आवेदन किया था, लेकिन उसके लिए हमारे सामने केवल घाटी में रहने की शर्त रखी गई थी। वह एक अस्वीकार्य शर्त थी।"
यहीं पर सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल के जम्मू पहुंचने से पहले ही इसके सदस्यों के बीच मतभेद उभर कर सामने आ गए।
यही नहीं, सशस्त्र सेना विशेष शक्तियां अधिनियम (एएफएसपीए) पर भी जम्मू एवं कश्मीर में सत्ताधारी गठबंधन के घटक दलों -कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेस (नेकां) के बीच मतभेद सतह पर दिखे।
लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों के अलग-अलग समूहों में अलगाववादी नेताओं से मिलने की सार्वजनिक आलोचना की।
इस बीच, कांग्रेस की राज्य इकाई ने एएफएसपीए को हटाने या उससे छेड़छाड़ करने को खतरनाक करार दिया जबकि नेकां ने एएफएसपीए को हटाए जाने का आग्रह किया है।
इससे इतर राज्य के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने इस दौरे से किसी ठोस नतीजे के निकलने की उम्मीद जताई है और साथ ही प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों के अलगाववादी नेताओं से मुलाकात करने की सराहना की।
जम्मू के लिए रवाना होने से पहले चिदम्बरम ने अन्य सदस्यों के साथ घाटी के तंगमार्ग शहर का दौरा किया, जबकि प्रतिनिधिमंडल के अन्य सदस्यों ने उन अस्पातालों का दौरा किया जहां हिंसा में घायल हुए लोग भर्ती हैं। इस शहर में गत 13 सितम्बर को हिंसा के दौरान छह लोगों की मौत हो गई थी।
प्रतिनिधिमंडल में मतभेद उस वक्त सामने आए जब सुषमा ने पत्रकारों से चर्चा में कहा कि केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदम्बरम की अध्यक्षता में हुई प्रतिनिधिमंडल की बैठक में अलगाववादी नेताओं से अलग-अलग समूहों में मिलने के संबंध में चर्चा भी नहीं हुई थी।
उन्होंने कहा कि कुछ प्रतिनिधियों ने अलगाववादी नेताओं से मुलाकात करने की इच्छा जरूर जाहिर की थी। उन्होंने कहा, "अलगाववादी नेताओं से मिलने का फैसला उनका अपना-अपना था। यह प्रतिनिधिमंडल का निर्णय नहीं था। यदि कोई जाना चाहे तो हम उसे रोक नहीं सकते। लेकिन हमने अलगाववादियों से नहीं मिलने का फैसला किया था।"
ज्ञात हो कि हुर्रियत नेताओं, सैयद अली शाह गिलानी, मीरवाइज उमर फारुख और यासीन मलिक ने दिल्ली से आए प्रतिनिधिमंडल से मिलने से इंकार कर दिया था, लेकिन प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों ने अलग-अलग समूह में जाकर इन नेताओं से सोमवार को मुलाकात की थी।
कांग्रेस के लोकसभा सदस्य लाल सिंह के नेतृत्व में पार्टी के एक दल ने सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात की। सिंह ने कहा कि एएफएसपीए को हटाने या उससे छेड़छाड़ करने की किसी भी कोशिश से और समस्याएं ही पैदा होंगी।
सिंह ने कहा, "हमने सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल से कहा है कि एएफएसपीए को अपनी जगह बने रहने दिया जाए, क्योंकि इसके साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ जम्मू एवं कश्मीर के हालात के लिए खतरनाक होगा।"
बहरहाल, कांग्रेस का यह दृष्टिकोण उसके सहयोगी दल, नेशनल कांफ्रेस से भिन्न है। नेशनल कांफ्रेंस ने एएफएसपीए को हटाए जाने का आग्रह किया।
ज्ञात हो कि एएफएसपीए, सेना को इस बात का व्यापक अधिकार देता है कि वह किसी को भी बिना वारंट के गिरफ्तार कर सकती है, गोली मार सकती है और अशांत इलाकों में संपत्तियों को नष्ट कर सकती है।
उधर, रक्षा राज्य मंत्री एम.एम. पल्लम राजू ने नई दिल्ली में पत्रकारों से कहा, "कश्मीर की मौजूदा स्थिति के लिए सेना जिम्मेदार नहीं है। एएफएसपीए एक 'आवश्यक सुरक्षा कवच' है जिसकी आतंकवाद से लड़ने के लिए सेना को जरूरत पड़ती है।"
उन्होंने कहा, "कश्मीर में अभी भी स्थिति पूरी तरह सामान्य नहीं है। ऐसे में एएफएसपीए में किसी तरह का संशोधन नहीं हो सकता और न ही इसे कुछ इलाकों से हटाया जा सकता।"
राजू ने कहा कि सेना को अनावश्यक जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। राज्य का संकट लोगों की आकांक्षाओं से जुड़ा है न कि उस कानून से जो सेना को आतंकवाद से लड़ने का पूरा अधिकार देता है।
यह पूछे जाने पर कि कश्मीर के जिन हिस्सों में आतंकी हिंसा में कमी आई, क्या वहां से इस कानून को हटाया जा सकता है, राजू ने कहा कि यह संभव नहीं है, क्योंकि आतंकियों को एक इलाके से दूसरे इलाके में पहुंचने में और वहां अशांति फैलाने में बहुत कम समय लगता है।
राजू ने पाकिस्तान का नाम लिए बगैर कहा कि राज्य में अशांति भड़काने वाले तत्व अभी भी सक्रिय हैं।
राजू ने कहा कि एएफएसपीए का मुद्दा उठा कर जम्मू एवं कश्मीर में सेना को बलि का बकरा बनाया जा रहा है।
राजू ने जोर देकर कहा, "मेरा आकलन यह है कि बड़ी चुनौती राज्य के लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करने की है। इसे केंद्र और राज्य स्तर पर अच्छे शासन के जरिए ही पूरा किया जा सकता है। जम्मू एवं कश्मीर में शांति और सामान्य स्थिति बहाल किए जाने का लक्ष्य होना चाहिए और सेना की उपस्थिति इस उद्देश्य में मदद ही कर रही है।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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