झारखंड मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे अर्जुन मुंडा

लेकिन कहा जा रहा है कि भाजपा के नेतृत्व वाली इस सरकार के शपथ ग्रहण समारोह में भाजपा के शीर्ष नेता शामिल नहीं होंगे. संसदीय दल के चेयरमैन लालकृष्ण आडवाणी, पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी, लोकसभा में पार्टी नेता सुषमा स्वराज और राज्यसभा में पार्टी नेता अरूण जेटली कोई भी इस समारोह में नहीं होगा.
उल्लेखनीय है कि पिछले अप्रैल में कटौती प्रस्ताव पर वोट को लेकर झामुमो और भाजपा के बीच राजनीतिक खींचतान शुरु हुई थी जो मुख्यमंत्री शिबू सोरेन के इस्तीफ़े और आख़िरकार राज्य में राष्ट्रपति शासन पर ख़त्म हुई थी. यह सरकार सिर्फ़ पाँच महीने चल सकी थी.
अब अर्जुन मुंडा ने झामुमो, जदयू, एजेएएसयू और दो निर्दलीय विधायकों के साथ मिलकर सरकार बनाने का फ़ैसला किया है. इस बात पर भाजपा के भीतर विवाद रहा है कि झामुमो के साथ सरकार के गठन के लिए भरोसा किया जाना चाहिए या नहीं.
वैसे तो कहा जा रहा है कि ईद और गणेश चतुर्थी एक साथ पड़ने की वजह से लालकृष्ण आडवाणी शपथ ग्रहण समारोह में नहीं जा रहे हैं. लेकिन कहा जा रहा है कि वे इस तरह सरकार के गठन से ख़ुश नहीं हैं और इसलिए वे इस समारोह में नहीं जाना चाहते. वे चाहते थे कि झामुमो के साथ पुराने अनुभव के बाद उसके साथ मिलकर सरकार का गठन नहीं किया जाना चाहिए.
पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी के बारे में भी कहा गया है कि वे गणेश चतुर्थी के समारोहों की वजह से शपथ ग्रहण में नहीं होंगे. जो नेता इस समारोह में निश्चित तौर पर उपस्थित होंगे उनमें पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राजनाथ सिंह हैं क्योंकि वे पार्टी में झारखंड के मामलों के प्रभारी हैं. इसके अलावा रविशंकर प्रसाद और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल हैं.
अर्जुन मुंडा ने गत सात सितंबर को राज्यपाल से मिलकर सरकार के गठन का दावा पेश किया था. उन्होंने 45 विधायकों की एक सूची भी राज्यपाल को सौंपी थी. इसके बाद केंद्र सरकार ने राज्य में राष्ट्रपति शासन हटाने की सिफ़ारिश की थी. लगभग साढ़े तीन महीने के बाद राज्य में सरकार का गठन होने जा रहा है.
झारखंड में राजनीतिक खींचतान तब शुरु हुआ जब अप्रैल के आख़िरी सप्ताह में संसद में कटौती प्रस्ताव में शिबू सोरेने ने कांग्रेस का साथ दिया. जबकि वे राज्य में भाजपा के समर्थन से सरकार चला रहे थे. इसके बाद भाजपा ने समर्थन वापसी की घोषणा की तो शिबू सोरेन थोड़े झुके. लंबी राजनीतिक खींचतान के बाद आख़िर 18 मई को दोनों दलों ने एक समझौते की घोषणा की थी जिसके अनुसार कहा गया था कि दोनों दलों ने 28-28 महीने सत्ता का बँटवारा करेंगे.
लेकिन आख़िर कोई फ़ैसला नहीं हो सका था और शिबू सोरेन ने 30 मई को इस्तीफ़ा दे दिया था. राजनीतिक विकल्प के अभाव में पहली जून से राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया था. झारखंड विधानसभा में कुल 82 विधायक हैं. एंग्लो-इंडियन समुदाय के एक नामित विधायक जोसेफ़ पी गालसटोन की जून में मौत हो गई थी.
सूची में भाजपा और झामुमो के 18-18 विधायक हैं जबकि जदयू के दो और एजेएएसयू के पाँच और दो निर्दलीय विधायक शामिल हैं. समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक इस बीच दिल्ली में कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने झारखंड में राजनीतिक सरगर्मियों को लेकर बैठक की है. झारखंड विधानसभा में कांग्रेस के 14 विधायक हैं. लेकिन कांग्रेस ने इन गतिविधियों से ख़ुद को दूर रखा है.












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