उद्योग जगत ने हड़ताल की आलोचना की
एसोचैम की अध्यक्ष स्वाति पीरामल ने कहा, "प्रमुख श्रम संगठनों द्वारा आयोजित की गई यह हड़ताल पूरी तरह अतार्किक है। इस तरह की हड़तालों से किसी उद्देश्य की पूर्ति नहीं होती केवल उत्पादकता घटती है और समाजिक और आर्थिक विकास अवरुद्ध होता है।"
पीरामल ने कहा, "रोजगार वृद्धि और देश की आर्थिक और सामाजिक तरक्की के लिए विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में विदेशी पूंजी की आवश्यकता है और इसका विरोध करने से विकासशील भारतीय अर्थव्यवस्था अलग-थलग पड़ जाएगी।"
"प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्थाओं में अस्तित्व बनाए रखने के लिए विदेशी निवेश और विनिवेश आज के समय की वास्तविकताएं हैं। राष्ट्रव्यापी हड़ताल जैसी गतिविधियों से इनका विरोध करने का कोई अर्थ नहीं।"
श्रमिक संगठनों का दावा है कि बैंकिंग, बीमा, ऊर्जा, दूरसंचार, रक्षा, परिवहन और पेट्रोलियम क्षेत्रों के करीब 10 करोड़ कर्मचारी इस हड़ताल में शामिल हुए हैं।
भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) ने भी इस हड़ताल की आलोचना की है।
सीआईआई की निर्यात समिति के अध्यक्ष संजय बुधिया ने कहा, "बंद के कारण व्यापार की भारी हानि हुई है और लोगों को भारी परेशानी झेलनी पड़ी है। राजनीतिक पार्टियों को लोकतांत्रिक तरीके से बहस और विचार-विमर्श के जरिए मुद्दों का समाधान ढूढना चाहिए।"
पीएचडी चैंबर ने कहा कि यह हड़ताल गलत समय पर आयोजित की गई है। ऐसे समय में जब देश आर्थिक मंदी के बाद पटरी पर लौट रहा है तब हड़ताल से उद्योगों को भारी नुकसान पहुंचा है।
ऑल इंडिया बैंक एम्पलाइज एसोसिएशन के मुताबिक बैंकों के करीब 10 लाख कर्मचारी बैंकों में विदेशी निवेश बढ़ाने और नए विदेशी बैंकों को भारतीय बाजार में उतरने की छूट देने के प्रस्तावों के खिलाफ हड़ताल कर रहे हैं। हड़ताल के चलते बैंकों में कामकाज प्रभावित हुआ।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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