बचे मज़दूरों को वापस लाने की कवायद

सलमान रावी
बीबीसी संवाददाता, रायपुर
छत्तीसगढ़ के जांजगीर ज़िले के बनारी गाँव में मातम पसरा हुआ है. चौपाल पर भीड़ है और एक व्यक्ति अपने मोबाइल फ़ोन पर जोर-जोर से बात कर रहा है. कुछ देर बाद वह निराश होकर बताता है,"कुछ पता नहीं चला."
चौपाल पर जमा ये लोग जम्मू कश्मीर के लेह में बदल फटने से मची तबाही में गायब हुए छत्तीसगढ़ के मज़दूरों के रिश्तेदार है.
ज़िले के कलेक्टर ब्रजेश चंद्र मिश्र के मुताबिक़ क़रीब 180 लोग मज़दूरी के लिए लेह गए थे. इनमें से 20 के मारे जाने और 40 मज़दूरों के घायल होने की बात कही जा रही है. वहीं 50 से अधिक मज़दूरों का अभी कोई पता नहीं चल पाया है.
लेह में फँसे छत्तीसगढ़ के मजदूरों को वापस लाने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार नें एक राहत दल को लेह भेजा है. यह दल वहाँ के अधिकारियों के संपर्क में है.
प्रदेश सरकार नें मज़दूरों को वापस लाने के लिए एक हवाई जहाज की भी व्यवस्था करने की बात कही है.
लेह में मारे गए मज़दूरों में सबसे अधिक महंत गाँव के निवासी हैं. लेह पहुँचे राहत दल नें बताया है कि कुछ मज़दूरों को बिलासपुर भेजा जा रहा है.
जांजगीर के बोडसरा, खेरा, महंत लोहिंस और बनारी गाँव से हर साल बड़ी संख्या में मज़दूर लेह जाते हैं.
बनारी के 21 साल के भरत ख़ुद को खुशकिस्मत महसूस कर रहे हैं.वे लेह जाने वाले थे. लेकिन एक ज़रूरी काम पड़ जाने की वजह से नहीं जा पाए.
उनके पास ऐसे लोगों की सूची है जो लेह गए थे.वे कहते हैं,'' यह सूची हमारे गाँव के उन लोगों की है जो मज़दूरी करने लेह गए हुए हैं. इनमें से 13 के मरने कि पुष्टी हो गई है जबकि 20 गंभीर रूप से घायल हैं. लेकिन बहुत से लोगों से संपर्क नहीं हो पा रहा है."
गंगा प्रसाद धीवर अपने 22 साल के बेटे की मौत के बाद बिलख-बिलख कर रो रहे हैं. लोग उन्हें दिलासा दे रहे हैं. ख़बर मिली है कि उनके पुत्र का अंतिम संस्कार लेह में ही कर दिया गया है.
अपनों की तलाश
बनारी से क़रीब 12 किलोमीटर दूर बोडसरा गाँव हैय यहाँ की मोहर्मती देवी के देवर-देवरानी कि मौत इस घटना में हो गई है और उनका बेटा-बहू घायल हैं. उनके पोते-पोती का कोई सुराग नहीं मिल रहा है.
इस गाँव के राजकुमार बताते हैं," फ़ोन भी नहीं लग रहा है. कुछ पता नहीं चल पा रहा है. मेरी माँ की लाश तो मिल गई लेकिन मेरे परिवार के ही तीन और लोगों को कोई अता-पता नहीं है."
कलेक्टर ब्रजेश चंद्र मिश्र ने बताया कि 17 मज़दूरों के एक जत्थे को लेह से छत्तीसगढ भेजने की सूचना मिली है.
इस घटना के बाद अब यह सवाल उठ रहा है कि जांजगीर में मनरेगा लागू होने और उद्योग-धंधों के होने के बाद भी लोग मज़दूरी करने दूसरी जगह क्यों गए?
इस सवाल पर कलेक्टर तो कुछ नहीं कहते लेकिन बनारी के लोग बताते हैं कि कई महीनों से उन्हें मनरेगा की मज़दूरी नहीं मिली है.
यहाँ के शिव कुमार यादव बताते हैं,"लेह में सड़क से बर्फ हटाने के काम का अच्छा पैसा मिलता है. वहाँ गए मज़दूर छह महीने अच्छा पैसा कमाकर वापस लौटते हैं. इस बार जांजगीर के ये मज़दूर आगरा के एक दलाल के झांसे में आकर वहाँ गए थे."
कलेक्टर ब्रजेश चंद्र मिश्र के मुताबिक़ ग्रामीणों के इस पलायन का कोई कारण नहीं है. यहाँ रोजगार के भरपूर अवसर हैं. वे मामले कि जांच कराने की भी बात करते हैं.
प्रदेश सरकार ने इन मज़दूरों को आर्थिक सहायता देने की बात कही है लेकिन कितना इसकी अभी कोई घोषणा नहीं की गई है.












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