भीगा-भीगा आंचल.. पागल ना कर दे मुझे...

जब एक तरफ के आकाश पर काली घटाएं उमड़ घुमड़ कर उठती हैं तो लोगों के चेहरे इस कदर उल्लासित होते हैं कि अगर उनकी धड़कनों और बुदबुदाहट को सुना जाए तो पता चलेगा वे किसी ना किसी 'राग मल्हार" में मदमस्त हुए जा रहे हैं।
प्रेम की बारिश में नहाया मन
नौजवान अपने प्रेमिल स्वप्नों की इमारत खड़ी करते हैं, जिसमें अपने प्रिय के साथ बारिश में नहाने का कोई रूमानी सिनेमाई दृश्य रह रह कर तैरता रहता है। नर्म नाजुक एहसास बारिश में भीगकर रूई के फाहों की तरह उड़ते हुए बादलों के साथ प्रतियोगिता में दौड़े जा रहे हैं। 'रिमझिम के गीत सावन गाए, गाए...।"
उम्रदराज लोगों के लिए यह महंगाई से राहत देने का जरिया बन गया है। यूं मन-मयूर तो उनका भी नाच रहा है लेकिन वो आयु बंधन की वजह से मन मसोस कर रह जाते हैं। उन्हें संतोष करना पड़ता है बस गर्मागर्म पकौड़ों और चाय की चुस्कियों के साथ। शहर के हर गली-नुक्कड़ पर नमकीन-कचौरी-पकौड़ियों की दुकानों पर आपको इस मौसम में भारी भीड़ देखने को मिलेगी।
भीगा-भीगा मन
इस समय घरों में गृहिणियां रसोई में व्यस्त हैं और खुश्ाबुओं का सागर हिलोरें ले रहा है। कोई चिंता नहीं कि गीले कपड़े सूख नहीं पा रहे या कि सीलन के मारे तकलीफ हो रही है। भले ही सावन के झूले अब सिर्फ कल्पना में रह गए हों, लेकिन गृहिणियों के लिए यह बरखा के गीत गाने का मौसम है, लहरिया ओढ़ने और संजने-संवरेन का दिन हैं। सही कहा ना साथियों है न कुछ गुलाबी सा, ठंडा सा और अपनो को करीब लाने वाला सावन.. आप ही लुत्फ उठाइये...इस मदमस्त मौसम का।












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