बिहार के किसानों के सपनों पर सूखे ने पानी फेरा
बिहार में ऐसी स्थिति केवल राम प्रवेश की ही नहीं बल्कि हजारों किसानों की बनी हुई है। राज्य में मानसून की बेरुखी से सैकड़ों किसानों के सपने पूरे होने से पहले ही बिखर गए हैं। औरंगाबाद के किसान जीतन मांझी बेटे को पढ़ने के लिए पटना भेजने वाले थे परंतु खेत परती (कोई फसल नहीं लग पाने की स्थिति) रहने के कारण उनके सपने भी महज सपने ही बनकर रह गए हैं।
इस वर्ष राज्य में 35़ 50 लाख हेक्टेयर भूमि पर धान की खेती का लक्ष्य रखा गया था परंतु अगस्त के पूर्व तक केवल 13़ 60 लाख हेक्टेयर में ही धान की खेती हो पाई है। धान की खेती की स्थिति पर गौर करें तो गया में अब तक जहां 0़ 42 प्रतिशत ही धान की रोपाई हो पाई है तो जहानाबाद में 0़ 68, नालंदा में 1़ 56, जमुई में 2़ 35, शेखपुरा में 1़ 43 तथा औरंगाबाद में 5़ 67 प्रतिशत ही धान की रोपाई हुई है। इसी तरह पटना में लक्ष्य के हिसाब से 12़ 67 प्रतिशत, बांका में 6़ 83, मुंगेर में 9़ 00 तथा भागलपुर में 10 प्रतिशत ही रोपाई हो पाई है।
कृषि विभाग के एक अधिकारी के अनुसार इस वर्ष राज्य में धान के उत्पादन का लक्ष्य 70़ 45 लाख टन तथा मक्के के उत्पादन का 9़ 00 लाख टन रखा गया था परंतु अब इसे पूरा कर पाना काफी मुश्किल है। वह दबी जुबान यह भी मानते हैं कि इस वर्ष किसानों के लिए स्थिति काफी बदतर हो गई है।
इस बीच बिहार सरकार ने 38 में से 28 जिलों को सूखाग्रस्त घोषित कर किसानों के ऋण माफ करने की प्रक्रिया भी प्रारंभ कर दी है। राज्य के आपदा प्रबंधन विभाग के प्रधान सचिव ब्यासजी कहते हैं कि केंद्र सरकार से आर्थिक मदद मांगी गई है तथा राज्य सरकार उपलब्ध संसाधनों से तत्काल राहत कार्य चलाने की योजना तैयार कर रही है। उन्होंने कहा कि सूखे की स्थिति की प्रतिदिन विभाग द्वारा समीक्षा की जाएगी।
उल्लेखनीय है कि पिछले वर्ष राज्य सरकार ने 26 जिलों को सूखाग्रस्त घोषित किया था।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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