बेनूर हो गया है सावन का हरियाली तीज
लेकिन आज बदलते वक्त ने हर चीज बदल दी है, परंपराये तो जैसे ईद का चांद हो गई है। त्योहारों का व्यवसायीकरण हो गया है और संबंधों में शिथिलता आ गई है। ऐसे में, हरियाली तीज का रूप-रंग हमें हर जगह एक-सा देखने को नहीं मिलता।
बेनूर हो गया है सावन का हरियाली तीज
घर के बुजुर्ग कहते हैं कि हरियाली तीज का त्योहार हमें प्रकृति और पर्यावरण से जुडे रहने का संदेश देता है। सावन के मौसम में जहां चारों ओर हरियाली से भरे बाग-बगीचे, फूलों की खुशबू और रंगों से माहौल सराबोर रहता है, उसी तरह हमें अपने जीवन में भी हरियाली बनाए रखनी होगी। खासकर संबंधों की हरियाली को बरकरार रखना बहुत जरूरी है।
शायद वो गलत नहीं है क्योंकि आज इंसान के पास सब कुछ है सिवाय रिश्तों और अपनों के । साहित्य कार भी मानते हैं कि अब न संबंधों में पहली-सी बात रह गई है और न तीज-त्योहारों में। पहले सखियां मिलकर सावन के गीत गाती थीं, झूला, कजरी के गीतों की महफिल सजती थी। आज सखियों से मिलने की बात तो बहुत दूर, पति से भी मोबाइल पर ही बात होती है। साडी-लहंगे और सलवार-सूट के साथ पहनी जाने वाली चूडियां भी आज जींस के साथ पहनी जा रही हैं।
त्योहारों में अपनत्व कम, बाजारवाद ज्यादा
सास-ननदें और पति इस बात से सुकूनकर लेते हैं कि चाहे लघु रूप में ही सही, परंपराओं का निर्वाह तो हो रहा है। भले ही इनके निर्वाह में श्रद्धा, प्रेम और अपनत्व का कम और बाजारवाद ज्यादा हावी हो गया है।
पति की लंबी उम्र के लिए सुहागिनों का हरियाली तीज का उपवास भी महज एक औपचारिकता बन कर रह गया है, इसलिए जरूरत है अपने रिश्तों ओर परंपराओं को फिर संजोने की ताकि हम अपने आने वाली पी़ढ़ियों को कह सके कि हमारे देश के त्योहार तोड़ने का नहीं बल्कि जोड़ने का काम करते हैं।
अगर अभी भी चेता नहीं गया तो आने वाले वक्त में हमारे पास अपने बच्चों को देने और बताने के लिए कुछ नहीं होगा। न तो परंपराये और न ही रिश्तें .....













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