श्रीलंका के बाद नेपाल में भी संयुक्त राष्ट्र का विरोध

काठमांडू, 10 जुलाई (आईएएनएस)। श्रीलंका के बाद अब नेपाल में भी संयुक्त राष्ट्र का विरोध शुरू हो गया है।

श्रीलंका में जहां एक मंत्री ने संयुक्त राष्ट्र के कथित हस्तक्षेप का विरोध किया है, वहीं नेपाल के प्रधानमंत्री ने संयुक्त राष्ट्र पर आरोप लगाया है कि उसने नेपाल की कमजोर शांति प्रक्रिया को पटरी से उतारने की कोशिश की है।

नेपाल में संयुक्त राष्ट्र का विरोध कार्यवाहक प्रधानमंत्री, माधव कुमार नेपाल ने किया है। उन्होंने नेपाल में संयुक्त राष्ट्र की राजनीतिक इकाई द्वारा तैयार की गई एक अनचाही योजना का विरोध किया है।

इस योजना के तहत माओवादी पार्टी की गुरिल्ला सेना के 19,000 से अधिक लड़ाकों के पुनर्वास के विवादास्पद मामले को निपटाने की कोशिश की गई है। ये सभी लड़ाके फिलहाल नेपाल स्थित संयुक्त राष्ट्र मिशन (यूएनएमआईएन) की निगरानी में हैं।

यूएनएमआईएन ने इन लड़ाकों के भविष्य का निर्धारण 60 सप्ताहों के भीतर करने की एक महत्वाकांक्षी योजना तैयार की है। उसने अपनी यह योजना पिछले महीने सत्ताधारी पार्टियों और विपक्षी पार्टी के समक्ष रखी थी।

60 सप्ताह की इस योजना के बाद माओवादियों ने पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के सैनिकों के लिए खुद की योजना तैयार की, जिसे शनिवार को आयोजित तीन प्रमुख पार्टियों की बैठक में रखा जाएगा।

पीएलए, नेपाल की शांति प्रक्रिया के रास्ते का मुख्य रोड़ा बना हुआ है।

जहां सत्ताधारी पार्टियां चाहती हैं कि समानांतर सेना समाप्त कर दी जाए, वहीं माओवादी इस प्रक्रिया को रोकना चाहते हैं और सभी लड़ाकों को सेना में शामिल किए जाने की मांग कर रहे हैं। जबकि माओवादियों के प्रमुख, प्रचंड ने राजनीतिक नेताओं के समक्ष इस बात पर सहमति जताई है कि सरकारी सेना में लगभग 5,000-7,000 लड़ाकों को शामिल किया जाए।

पीएलए को लेकर पैदा हुए लंबे गतिरोध ने नए संविधान की लेखन प्रक्रिया को पटरी से उतार दिया है और अब प्रधानमंत्री के इस्तीफे के 10 दिनों बाद भी यह मसला नई सरकार के निर्माण में रोड़ा बना हुआ है।

सरकारी मीडिया के अनुसार प्रधानमंत्री नेपाल ने शनिवार को कहा, "जब नए संविधान को लिखने के लिए मात्र 11 महीने शेष रह गए हैं, वैसे यूएनएमआईएन ने माओवादी लड़ाकों को सेना में शामिल करने और उनके पुनर्वास के लिए 14 महीने लंबी समय सारिणी का सुझाव दिया है।"

नेपाल ने कहा, "नए संविधान को लिखने की प्रक्रिया को पटरी से उतारने की यह एक चाल है।"

प्रधानमंत्री ने कहा कि नेपाल को ऐसे अनुभवों की जरूरत नहीं है, जो अन्य देशों में विफल हो चुके हों।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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