श्रीलंका के लिए यूएन की समिति

महासचिव के प्रवक्ता ने कहा है कि यह समिति मानवाधिकार हनन के लिए दोषी लोगों की जवाबदेही भी तय करेगी.उल्लेखनीय है कि अलग राष्ट्र के लिए संघर्ष कर रहे तमिल विद्रोहियों के ख़िलाफ़ युद्ध में श्रीलंका सेना पर मानवाधिकार हनन के आरोप लगे थे और युद्धापराधों की जाँच न करवाने के लिए सरकार की निंदा भी की गई है.इस समिति में तीन सदस्य होंगे.
इनमें से एक इंडोनेशिया के पूर्व एटॉर्नी जनरल हैं, दूसरे दक्षिण अफ़्रीका के मानवाधिकार मामलों के वकील हैं और तीसरे अमरीका के अंतरराष्ट्रीय क़ानूनविद हैं.यह कोई जाँच समिति नहीं है और इसके अधिकार बहुत स्पष्ट नहीं हैं.इस समिति को संयुक्त राष्ट्र महासचिव को यह सुझाव देना है कि अगर मानवाधिकार का हनन हुआ है तो लोगों की जवाबदेही किस तरह से तय की जाएगी.
समिति के गठन से इस मामले की संवेदनशीलता ज़ाहिर हुई है.श्रीलंकाई अधिकारी इस बात को सिरे से ख़ारिज करते आए हैं कि संघर्ष के अंतिम दिनों में मानवाधिकार उल्लंघन के मामले हुए थे.वहाँ सरकार ने इस मामले की जाँच के लिए अपनी ओर से एक जाँच बिठा दी है और समिति के गठन के लिए संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून की निंदा की है.
संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि युद्ध के आख़िरी पाँच महीनों में सात हज़ार नागरिकों की मौत हुई है.मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि उनके पास इस बात के फ़ोटोग्राफ़िक और वीडियोग्राफ़िक प्रमाण हैं कि सेना ने तमिल विद्रोहियों को मौत के घाट उतार दिया और आम नागरिकों पर अंधाधुंध बन बरसाए.दूसरी ओर विद्रोहियों पर आरोप लगे कि उन्होंने लोगों का रक्षाकवच की तरह उपयोग किया और जिसने भी युद्ध क्षेत्र से निकलने की कोशिश की उसकी जान ले ली गई.
हालांकि न तो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने और न ही संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार परिषद ने इसकी जाँच की मांग की.ऐसे में कहा जा सकता है कि यह जवाबदेही तय करने का संयुक्त राष्ट्र महासचिव का तरीक़ा है.उनके प्रवक्ता ने इस बात की संभावना से इनकार नहीं किया है कि यदि राष्ट्रीय जाँच अपर्याप्त महसूस होती है तो इस पूरे मामले की अंतरराष्ट्रीय जाँच की जाए.












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