नीतीश की ज़िद, भाजपा की मुश्किल

मणिकांत ठाकुर
बीबीसी संवाददाता, पटना
बिहार में सत्तारूढ़ जनता दल यूनाइटेड (जद-यू) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) गठबंधन मुश्किल में पड़ गया है.मंगलवार को बिहार भाजपा के कोर ग्रुप की बैठक पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी के निवास पर आयोजित की गई है जिसमें विचार किया जाएगा कि पार्टी को गठबंधन में रहना चाहिए या नहीं.
भाजपा के बिहार इकाई के अध्यक्ष सीपी ठाकुर दिल्ली में हैं और बिहार के दूसरे प्रमुख नेताओं सुशील मोदी, नंदकिशोर यादव को भी दिल्ली बुलवाया गया है.राजनीतिक विश्लेषक मान रहे हैं कि गठबंधन गंभीर संकट के दौर से गुज़र रहा है.लेकिन सीपी ठाकुर ने बीबीसी से कहा, "मसला गंभीर तो नहीं है लेकिन इस पर विचार करना ज़रुरी लग रहा है."
सीपी ठाकुर ने बीबीसी को बताया, "अभी कोई चर्चा नहीं हुई है. मंगलवार को रात नौ बजे बिहार के सभी नेता पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी के निवास पर एकत्रित होंगे और वहीं इस विषय में विस्तार से चर्चा होगी."जदयू के रवैये पर पूछे गए सवाल पर उन्होंने कहा, "शरद जी का बयान तो ठीक आ रहा है लेकिन दूसरे लोगों ने बहुत कुछ कहा है."समाचार एजेंसी पीटीआई से हुई बातचीत में उन्होंने कहा, "अगर हमें बाध्य किया गया तो हम अकेले चुनाव में जाने के लिए तैयार हैं लेकिन हम चाहते हैं कि यह गठबंधन जारी रहे."
नीतीश की शर्तें
बिहार में इसी साल अक्तूबर में चुनाव होने की संभावना है और अटकलें लगाई जा रही हैं कि नीतीश कुमार इन चुनावों में अकेले जाने की तैयारी कर रहे हैं.नीतीश कुमार ने सोमवार को पत्रकारों से कहा, "टेंशन मत लीजिए, रिलैक्स कीजिए."दरअसल नीतीश कुमार चाहते हैं कि बिहार विधानसभा चुनावों के दौरान गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और वरुण गांधी बिहार में प्रचार करने न आएँ.
ये भाजपा के लिए गंभीर स्थिति है, वह नरेंद्र मोदी को अपने प्रमुख नेता के रूप में पेश कर रही है.इसके पहले पटना में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के दौरान अख़बारों में नीतीश कुमार और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की हाथ में हाथ थामे एक तस्वीर विज्ञापन की तरह अख़बारों में छपी, तो इस पर नीतीश कुमार ने कड़ी आपत्ति की.
इस विज्ञापन में गुजरात सरकार की ओर से कोसी के बाढ़ पीड़ितों को दी गई सहायता का ज़िक्र किया गया था.इसके बाद आरोप-प्रत्यारोपों के बीच नीतीश कुमार ने गुजरात सरकार को बाढ़ पीड़ितों को दिए गए पाँच करोड़ रुपए वापस लौटा दिए.लेकिन इसकी कोसी की बाढ़ से सबसे अधिक क्षेत्रों प्रभावित सुपोल, सहरसा और मधेपुरा में तीखी प्रतिक्रिया हुई है.
बिहार सरकार का कहना है कि ये राशि बची रह गई थी इसलिए लौटाई जा रही है. ये विरोधाभासी बयान है क्योंकि राज्य सरकार पैसे की कमी की बात कहती आई है.लोगों का कहना है कि बाढ़ की तबाही पर राजनीति नहीं होनी चाहिए.दरअसल ऐन चुनाव से पहले नीतीश कुमार राज्य के मुसलमान मतदाताओं को रिझाने के लिए भाजपा से दूरी दिखाना चाहते हैं.लेकिन इसमें वो सफल हो पाएँगे, इस पर भी सवाल उठ रहे हैं क्योंकि मुसलमानों के सामने कांग्रेस और आरजेडी-लोक जनशक्ति के रूप में दो विकल्प पहले से ही मौजूद हैं.












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