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गरीब जनता को मुंह चिढ़ा रही 'माया की तिजोरी'

By अंकुर शर्मा
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एक बार चुनावी जन सभा के मंच से उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने कहा था कि उनका नाम मायावती है और माया का मतलब पैसा होता है। तो क्या आज मायावती अपने नाम के अर्थ को भुना रही है। यूपी जो मतों के मामले में देश का सबसे बड़ा राज्य है जहां आधे से ज्यादा जनता भूखमरी की शिकार है वहां की मुख्यमंत्री आज करोंड़ो का मालकिन हैं। आज उनके पास 88 करोड़ से ज्यादा का बैंक बैलेस और लगभग 20 करोड़ से ज्यादा के हीरे के गहने हैं।

यानी आज अगर हम मायावती को महारानी मायावती कहें तो गलत नहीं होगा। आपको जानकर हैरत होगी कि मायावती दुनिया के सबसे अमीर देश के राष्‍ट्रपति से भी ज्‍यादा दौलतमंद हैं। मायावती के पास अमेरिकी राष्‍ट्रपति बराक ओबामा की तुलना में तीन गुना से भी ज्‍यादा ज्‍यादा संपत्ति है। यही नहीं मायावती भारत के सबसे अमीर नेताओं में शुमार हैं, जबकि ओबामा बीते छह दशक में अपने देश के सबसे गरीब राष्‍ट्रपति हैं। अब अगर इस अमीर सीएम के राज्‍य पर प्रकाश डालें तो सब कुछ एकदम उलट मिलेगा।

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बात शुरू करते हैं यूपी के बुदंलखंड की जहां के किसान आत्महत्या सिर्फ इसलिए कर रहे हैं क्योंकि उनके पास अपनी आजीविका के साधन नहीं हैं । यूपी आज से ही न हीं बल्कि पिछले कई दशकों से अभावों का शिकार है। क्योंकि राज्य के पुरोधा और सत्ताधारी कहते हैं कि विकास के लिए साधनों की जरूरत पड़ती है और साधन के लिए पैसे की, जो कि हमारे पास तो है ही नहीं।

मायावती ने पिछले स्वतंत्रता दिवस के मौके पर राजधानी लखनऊ के मंच से संबोधित करते हुए कहा था कि अगर आप यूपी का विकास चाहते हैं तो उसके तीन टुकड़े कर दो, ताकि हर एक हिस्से का सर्वागीण विकास हो, यही नही उनकी रैलियो में हमेशा एक मुद्दा अवश्य होता है कि केन्द्र नहीं चाहता कि यूपी विकास करें तभी तो वो यूपी को धन आवंटित नहीं कराता।

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कितनी अजीब बात हैं न, एक तरफ माया का कहना है कि राज्य में पैसा नहीं, और दूसरी तरफ उनकी तिजोरियां भर रही हैं। ये सब हुआ है उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद, खुद माया कह चुकी है कि उनका पैसा जनता का पैसा है, लेकिन वो पैसा कभी भी जनता के काम नहीं आता। मतलब साफ है कि राज्य के हिस्से करने को तैयार वाले ये नेता गण किसी भी हद तक जा सकते हैं न तो उन्हें देश की भोली भाली जनता की रोटी से मतलब है और न ही उन्हें इस बात से लेदा -देना है कि उनकी जनता रहती कैसे हैं?

अपने को दलितों का मसीहा बताने वाली मायावती बताये कि उन्होंन आज तक कितने दलितों को निवाला खिलाया है। न तो गरीबी दूर हुई है और न तो विकास ही हुआ है, जहां बिजली नहीं थी वहां आज भी अंधेरा है, जिसके घर पर छत नहीं थी वो आज भी चाहे गर्मी के थपेड़े हों या सर्दी की कंपकपाहट, वहां आज भी खुले आसमान की ही सहारा है ।

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कहने का मतलब साफ है कि सिवाया मायावती के बैंक बैलेंस बढने के राज्य में और किसी चीज का इजाफा नहीं हुआ है। हां आप इतना जरूर कह सकते हैं कि आपका लखनऊ आज पहले से ज्यादा सुंदर नजर आता है क्योंकि शहर में मूर्तियों की संख्या बढ़ गई है। दलितों की महारानी मायावती ने अपनी प्यारी जनता के लिए अपने पूर्वजों की मूर्तियां जरूर बनवा दी है ताकि उनकी प्यारी जनता उनको पूज सके और अपनी आने वाली नस्ल को बता सके कि देखो ये हैं तुम्हारे पूर्वज।

लेकिन माया को कौन बताये कि मूर्तियों की पूजा से पेट नहीं भरता, न ही उनकी वाहवाही से तन ढकता है और न ही माया के गुणगान से घर मिलता है। ये सब होने के लिए इंसान के पास पैसा होना चाहिए लेकिन शायद वो पैसा माया को अपने खाते में रखने में ज्यादा आनंद आता है बशर्ते कि वो आम इंसानो पर खर्च हो। खैर माया की माया, माया ही जाने फिलहाल हालात ये कहने में बिल्कुल पीछे नहीं है कि गरीब उत्तरप्रदेश की सीएम 'मायावती' हैं 'करोड़ो की मालकिन' ।

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