प्रधानमंत्री के प्रस्ताव को अलगाववादी नेताओं ने औपचारिकता बताया
हुर्रियत के कट्टरपंथी धड़े के नेता मीरवाइज उमर फारूख ने प्रधानमंत्री के वार्ता प्रस्ताव के एक दिन बाद मंगलवार को कहा, "वार्ता का यह प्रस्ताव महज औपचारिकता है, इसका लक्ष्य वैश्विक समूह को भ्रमित करना है।" सोमवार को प्रधानमंत्री ने संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार के दूसरे कार्यकाल का एक वर्ष पूरा होने पर आयोजित पत्रकार वार्ता में यह प्रस्ताव रखा था।
प्रधानमंत्री ने कहा था कि सरकार हिंसा छोड़ने वाले जम्मू एवं कश्मीर के अलगाववादियों से वार्ता के लिए तैयार है।
उन्होंने कहा था, "मैं मुख्यधारा की राजनीति से बाहर के सभी समूहों से अपील करता हूं कि यदि वे हिंसा छोड़ें तो हमारी सरकार उनसे बातचीत के लिए तैयार है।"
मीरवाइज ने कहा, "सच कहा जाए तो इस बयान में कोई नई बात नहीं है।"
कट्टरपंथी अलगाववादी नेता सैय्यद अली गिलानी ने कहा, "भारत कश्मीर समस्या को सुलझाने के लिए गंभीर नहीं है। कश्मीर में हिंसा के लिए कौन जिम्मेदार है? इसके लिए हम नहीं बल्कि भारतीय सुरक्षा बल जिम्मेदार हैं।"
उन्होंने कहा, "जब तक सरकार कश्मीर को विवादित क्षेत्र नहीं मानती तब तक हम किसी भी तरह की वार्ता नहीं करेंगे।"
मख्यधारा के कुछ राजनेताओं का कहना है कि अलगाववादियों को हिंसा के लिए जिम्मेदार ठहराने वाले बयानों से नई दिल्ली और कश्मीर के बीच विश्वास घटता है।
प्रधानमंत्री के प्रस्ताव पर प्रतिक्रिया देते हुए नेशनल कांफ्रेंस (एनसी) के वरिष्ठ नेता और अनंतनाग से लोकसभा सांसद मिराज मेहबूब बेग ने कहा, "आधिकारिकरूप से स्वीकार किया जा चुका है कि जम्मू एवं कश्मीर की स्थिति में पहले से काफी सुधार हो चुका है।"
उन्होंने कहा, "पिछले कुछ महीनों में हुए विरोध प्रदर्शन कहीं ज्यादा शांतिपूर्ण रहे हैं।"
उन्होंने कहा, "हम गोल-गोल घूम रहे हैं, आप आज बातचीत नहीं कर रहे हैं और कल यही करेंगे। भारत को कश्मीरी समूहों की अनुशंसाओं पर कार्रवाई करके कश्मीर और नई दिल्ली के बीच विश्वास में वृद्धि करनी चाहिए।"
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की राज्य इकाई के महासचिव मोहम्मद यूसुफ तारिगामी ने कहा, "पृथकतावादियों को आगे आकर वार्ता की प्रक्रिया में भाग लेना चाहिए।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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