देश की विदेश नीति काफी हद तक सफल (संप्रग सरकार का 1 वर्ष)

इस मामले में सिर्फ अफगानिस्तान एक ऐसा अपवाद रहा है, जहां भारत इस प्रश्न पर अटक-सा गया है कि वह अपने रणनीतिक हितों की हिफाजत कैसे करे।

यदि संप्रग का पहला कार्यकाल भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर से परिभाषित होता है, तो वहीं दूसरे कार्यकाल में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह नई दिल्ली में वाशिंगटन के साथ संबंधों में गतिशीलता को बनाए रखने की कोशिश में जुटे हुए हैं, खासतौर से व्हाइट हाउस में सत्ता परिवर्तन के बाद। इसके साथ ही वह पाकिस्तान के साथ संबंधों में बदलाव के लिए अपनी सारी ऊर्जा झोक रहे हैं।

यहां बीते वर्ष के दौरान भारत की विदेश कूटनीति और खास मुद्दों पर उसकी विदेश नीति के प्रभाव के बारे में बनी धारणा का संक्षिप्त खाका प्रस्तुत किया जा रहा है।

* अमेरिका के साथ संबंध :

वाशिंगटन में नए प्रशासन के दौरान भारत के साथ अमेरिका के रिश्ते को ठंडा पड़ जाने के व्यापक अनुमानों के बावजूद अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पिछले वर्ष नवंबर महीने में अपने राष्ट्रपति निवास में प्रथम राजकीय अतिथि के रूप में आमंत्रित कर इन सभी कयासों को झुठला दिया।

मनमोहन सिंह के दौरे से भारत-अमेरिका के संबंध, एक रणनीतिक संवाद की शुरुआत और एक ऐतिहासिक ज्ञान संबंधी पहल के साथ दूसरे चरण में प्रवेश कर गए। यह अलग बात है कि अफगानिस्तान-पाकिस्तान के मुद्दों पर दोनों देशों में मतभेद बरकरार हैं, लेकिन अमेरिका ने जोर देकर कहा है कि भारत 21वीं सदी में उसका एक अपरिहार्य साझेदार है।

* बांग्लादेश के साथ संबंधों में बदलाव :

पड़ोसी राज्यों के साथ एक कठिन झगड़े में लंबे समय से ठंडे पड़े भारत-पाकिस्तान के संबंधों में बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना के जनवरी 2010 में नई दिल्ली दौरे के दौरान नई गरमाहट आई है।

भारत ने बांग्लादेश के लिए एक अरब डॉलर के ऋण की घोषणा की। भारत की ओर से किसी देश को दिया जाने वाला यह पहला सबसे बड़ा द्विपक्षीय सहयोग था। इसके साथ ही दोनों देशों के बीच सुरक्षा और आतंक से मुकाबले में सहयोग संबंधी तीन समझौतों पर हस्ताक्षर हुए। ये समझौते भारत को इस संदर्भ में सक्षम बनाएंगे कि वह बांग्लादेश में उपस्थित भारत विरोधी आतंकियों तक पहुंच सके।

* संयुक्त राष्ट्र में सुधार :

यह एक दूसरी मामूली-सी सफलता थी, हालांकि इसे उतना संज्ञान में नहीं लिया गया। इब्सा (भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका) और ब्रिक (ब्राजील, रूस, भारत, चीन) ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत के लिए एक स्थायी सीट तथा वर्ष 2011-12 के लिए एक अस्थायी सीट की वकालत की।

* शर्म अल-शेख से थिंपू तक :

मनमोहन सिंह जब शर्म अल-शेख में पाकिस्तान के साथ संयुक्त घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर कर स्वदेश लौटे तो उन्हें तमाम विरोधों का सामना करना पड़ा। इस घोषणा पत्र में इस शर्त को एक तरह से समाप्त कर दिया गया था कि पाकिस्तान के साथ समग्र संवाद की बहाली, आतंक के खिलाफ उसके द्वारा की जाने वाली कार्रवाई पर निर्भर होगी। और इसके साथ ही उसमें बलूचिस्तान का संदर्भ जोड़ दिया गया था। इसे लेकर भारतीय संसद में काफी हो-हल्ला हुआ था और देश को बेचने का सरकार पर आरोप लगाया गया था।

संप्रग सरकार ने हालांकि पाकिस्तान पर दबाव बनाए रखा, जो अंतत: थिंपू में एक सहमति के रूप में सामने आया और दोनों देशों ने विदेश मंत्री स्तर पर संवाद बहाल करने का निर्णय लिया। हालांकि संप्रग सरकार (दूसरा कार्यकाल) का पाकिस्तान के साथ आदान-प्रदान की सफलता को लेकर लोगों की अलग-अलग राय है।

* चीन-भारत के बीच संबंध स्थिर, मगर पटरी पर :

पिछले वर्ष चीन के साथ संबंध एक कठिन रास्ते से होकर गुजरे हैं। चीनी अतिक्रमण में बढ़ोतरी संबंधी खबरें, भारत को एक बहुस्तरीय ऋण का चीन द्वारा इस आधार पर विरोध कि उसका एक हिस्सा अरूणाचल प्रदेश के लिए था और भारतीय प्रधानमंत्री व राष्ट्रपति के अरूणाचल दौरे का चीन द्वारा विरोध जैसे कुछ ऐसे मुद्दे थे, जिनने भारत-चीन संबंधों में तनाव पैदा कर दिया था। लेकिन अब लगता है कि दोनों देशों के संबंध वापस पटरी पर आ गए हैं।

दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों के बीच मुलाकात हुई है और भारतीय विदेश मंत्री ने चीन का दौरा किया है। इसके अलावा अगले सप्ताह राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील चीन के दौरे पर जाने वाली हैं।

* तालिबान मसला :

सरकार द्वारा अफगानिस्तान में 1.3 अरब डॉलर की पुनर्निर्माण परियोजनाओं को जारी रखने की प्रतिबद्धता के बावजूद चारों तरफ यह आम धारणा बनी हुई है कि 20 जनवरी को हुए लंदन सम्मेलन में, अच्छे तालिबान को अफगानी राजनीति की मुख्यधारा में प्रवेश संबंधी एक प्रस्ताव का समर्थन किए जाने के बाद लगता है कि भारत अफगानिस्तान में विफल साबित हो रहा है। प्रस्ताव पाकिस्तान की ओर से पेश किया गया था।

ओबामा प्रशासन ने अमेरिकी सैनिकों की अफगानिस्तान से वापसी के लिए जुलाई 2011 तक की समय सीमा निर्धारित की है। ऐसे में भारत सरकार इस बात को लेकर चितित है कि वह अफगानिस्तान में अपने रणनीतिक हितों की हिफाजत कैसे करे।

* जलवायु परिवर्तन पर कड़ा रुख :

भारत इस मुद्दे पर दिसंबर महीने में कोपेनहेगन में जलवायु परिवर्तन पर आयोजित शिखर सम्मेलन में कार्बन उत्सर्जन पर, उभरती अर्थव्यवस्थाओं के हितों को सामने लाने के लिए चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका के साथ एक शक्तिशाली गठबंधन बनाने में सफल हुआ था।

लेकिन घरेलू स्तर पर, संप्रग सरकार को जलवायु परिवर्तन संबंधी अपनी नीतियों की अंतर्राष्ट्रीय निगरानी की अनुमति देने के लिए आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था। जबकि इसके पहले सरकार ने कहा था कि वह अपने शमन कार्यक्रमों के बारे में केवल संयुक्त राष्ट्र की संबंधित एजेंसी को ही सूचित करेगा।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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