स्वर परीक्षण से पार्किं संस की जल्द पहचान संभव
वेबसाइट 'डेली मेल डॉट को डॉट यूके' के मुताबिक सामान्य रूप से पार्किं संस बीमारी का तभी पता चल पाता है जब इस बीमारी के स्पष्ट लक्षण दिखने लगते हैं। इसका मतलब है जब बीमारी का पता चलता है तब तक वह काफी बढ़ चुकी होती है और मरीज की मस्तिष्क कोशिकाओं का बहुत नुकसान हो चुका होता है।
इजरायल के हाइफा विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने एक कम्प्यूटर प्रोग्राम विकसित किया है। इस प्रोग्राम की मदद से पार्किं संस बीमारी पीड़ित की आवाज पहचानी जा सकती है। इस बीमारी के अनुवांशिक खतरे की संभावना वाले लोगों में इसका पता लगाने के लिए स्वर परीक्षण का इस्तेमाल किया जा सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह तकनीक तंत्रिका तंत्र संबंधी बीमारियों से ग्रस्त लोगों के लिए महत्वपूर्ण होगी क्योंकि दवाएं और इलाज भी तभी ज्यादा कारगर होते हैं जब बीमारी का शुरुआती अवस्था में पता चल जाता है।
स्वर परीक्षण के लिए मरीज को केवल कुछ वाक्य बोलना होते हैं। चिकित्सकों का मानना है कि शुरुआती अवस्था में बीमारी का पता चल जाने पर मरीज के मस्तिष्क के गति को नियंत्रित करने वाले हिस्से की 60 प्रतिशत तंत्रिका कोशिकाओं को नष्ट होने से बचाया जा सकता है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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