कश्मीर में हैं 2,000 वर्ष पुराने बौद्ध ताम्र पत्र
श्रीनगर, 10 अप्रैल (आईएएनएस)। जम्मू एवं कश्मीर के प्रसिद्ध इतिहासकार मोहम्मद यूसुफ तैंग का दावा है कि उन्हें 2,000 वर्ष पुराने एक बौद्ध अवशेष की जानकारी है, जिससे पता चलता है कि कश्मीर में प्राचीन काल में एक बौद्ध सम्मेलन आयोजित किया गया था।
तैंग ने कहा कि उन्हें 2,000 वर्ष पुराने ताम्रपत्रों के बारे में जानकारी है, जिनसे पता चलता है कि कश्मीर में बौद्ध सम्मेलन का आयोजन किया गया था। उन्होंने कहा कि वह उस स्थान का खुलासा तभी करेंगे जब राष्ट्रपति उन्हें इस बात का आश्वासन देंगी कि कुशान वंश के शासक कनिष्क के काल के इन ताम्रपत्रों को राज्य से बाहर नहीं ले जाया जाएगा।
तैंग ने कहा, "कश्मीर में कनिष्क काल में चौथा बौद्ध सम्मेलन आयोजित किया गया था। यह सम्मेलन छह माह तक चला था, जिसमें प्रसिद्ध बौद्ध विद्वान नागार्जुन सहित कई विद्वानों ने हिस्सा लिया था।" यह सम्मेलन कुंडलवन में आयोजित किया गया था लेकिन अब इसकी जानकारी नहीं है कि यह स्थान कहां है।
तैंग कहते हैं, "लेकिन मुझे पता है कि कश्मीर में कुंडलवन कहां है। 30 वर्षो के शोध के दौरान मुझे पता चला कि राज्य में 2,000 वर्ष पुराने ताम्रपत्र कहां हैं।" उन्होंने कहा कि वह चाहते हैं कि कश्मीर की ऐतिहासिक धरोहर यहीं रहे।
तैंग ने कहा, "अब मैं स्वस्थ नहीं रहता हूं। मैं चाहता हूं कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर को खोजा और संरक्षित किया जाए।" जब उनसे पूछा गया कि आखिर क्यों वह राष्ट्रपति से आश्वासन चाहते हैं, तो उन्होंने कहा, "अतीत में हमें कुछ कड़वे अनुभव मिले हैं।"
तैंग ने कहा कि पूर्व में राज्य से गिलगित पांडुलिपियों को बाहर ले जाया गया था। उन्होंने कहा, "डोगरा महाराज के शासन काल में प्रधानमंत्री रामचंद काक गिलगित पांडुलिपियों को यहां लाए थे। वर्ष 1947 में देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने शेख मुहम्मद अब्दुल्ला से कहा कि इन पांडुलिपियों को खतरों की आंशका की वजह से राज्य से बाहर स्थानांतरित किया जाना चाहिए।"
तैंग ने कहा कि नेहरू ने आश्वासन दिया था कि सबकुछ सामान्य होने के बाद इन पांडुलिपियों को कश्मीर को सौंप दिया जाएगा लेकिन अबतक ऐसा नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि ये दुलर्भ पांडुलिपि फिलहाल दिल्ली स्थित राष्ट्रीय अभिलेखागार में है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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