सड़कें सुधारने के बोध में देर हो गई

सड़कें सुधारने के बोध में देर हो गई

विनोद वर्मा

बीबीसी संवाददाता, हाइवे हिंदुस्तान से

आप भले ही बौद्ध धर्म के अनुयायी न हों, या आप भले ही धार्मिक न हों, लेकिन बोधगया के मंदिर परिसर की शांति मन को सुकून ज़रुर देती है.

माना जाता है कि यहीं वर्ष 623 ईसापूर्व में बोधिवृक्ष के नीचे गौतम बुद्ध को आत्मज्ञान की प्राप्ति हुई थी.

आज ढाई हज़ार साल बाद भी उस बोधिवृक्ष के नीचे जब जापानियों का एक दल, न समझ आने वाली भाषा में, प्रार्थना कर रहा हो, या श्रीलंका से आए श्रद्धालु सिंहली में मंत्रोच्चारण कर रहे हों तो उससे मन झंकृत हो जाता है.

लेकिन बोधगया पहुँचने के बाद ही पता चलता है कि आत्मिक शांति की इस जगह को, इसके ऐतिहासिक महत्व के बावजूद सरकारों ने बरसों बरस कितना उपेक्षित रखा था.

ख़ासकर सड़कों के मामले में.

अधिकारी बताते हैं कि यहाँ औसतन प्रतिमाह दस लाख पर्यटक और तीर्थयात्री आते हैं.

इनमें से बहुत से लोग सड़कों से ही यात्रा करते रहे हैं.

अब जब सड़कें सुधर गई हैं तो भी इस पर नियमित यात्रा करने वाले लोग पुराने दिनों की यात्रा को याद करके मानों सिहर से जाते हैं.

पर्यटक, तीर्थयात्री, टूर एंड ट्रवल्स ऑपरेटर सभी बताते हैं कि नई सड़कों के बनने से पहले तक बनारस से बोधगया तक की 260 किलोमीटर की दूरी तय करने में उन्हें 10-12 घंटे लगा करते थे.

ऐसा ही हाल पटना से बोधगया तक की यात्रा का था.

सँकरा, उबड़-खाबड़ रास्ता था जिस पर अक्सर ट्रकों की वजह से जाम लगा होता था.

अब नई सड़कों की वजह से यह दूरी सिर्फ़ ढाई-तीन घंटे में पूरी की जा रही है.

मंदिर परिसर के बाहर ही तथागत टूर्स एंड ट्रवल्स है. वहाँ काम करने वाले रंजीत कई बरसों से पर्यटकों और तीर्थ यात्रियों की यात्रा का इंतज़ाम कर रहे हैं.

वे बताते हैं कि पहले यात्री ट्रेन से ही यात्रा करना पसंद करते थे क्योंकि सड़कों से यात्रा करना उन्हें परेशान कर देता था.

सड़कों के बारे में वे कहते हैं, “सड़कों की स्थिति सुधरने के बाद सड़क के मार्ग से यात्रा करने वालों की संख्या 50 प्रतिशत तक जा पहुँची है, जो पहले 10-12 प्रतिशत ही रही होगी.”

बोधगया मंदिर प्रबंधन समिति के सचिव एन दोरजी रिटायर्ड आईएएस हैं. वे बताते हैं कि अब तो लोग भूटान, नेपाल, दिल्ली, कोलकाता और पूर्वोत्तर राज्यों से अपनी बसें लेकर आने लगे हैं, जो अच्छी सड़कों की वजह से ही संभव हुआ है.

वीरेंद्र कुमार शेरू कोई 15 वर्षों से जापानी तीर्थ यात्रियों को दिल्ली से बोधगया लाने-ले-जाने का काम करते हैं.

वे बताते हैं कि सड़कों के ठीक होने से पहले जब वे यात्रियों को ट्रेन से वाराणसी तक लाते थे तो उन्हें बस में अपने साथ खाने का इंतज़ाम करके भी चलना पड़ता था.

वे कहते हैं, “अब तो हम वाराणसी से निकलते हैं और सीधे बोधगया पहुँचकर गर्म खाना खिलाते हैं.”

वाराणसी में रहने वाले विनोद उपाध्याय को इस मार्ग पर टैक्सी चलाते हुए 12 वर्ष हो गए. वे बताते हैं कि पहले वे हफ़्ते में दो बार ही बोधगया आ पाते थे. लेकिन अब वे कई बार बार हफ़्ते में पाँच चक्कर भी लगा जाते हैं.

वे याद करते हैं, “सिंगल लेन सड़क थी, घुटने-घुटने भर गड्ढे हुआ करते थे और कोलकाता जाने आने वाली ट्रकों की भीड़ हुआ करती थी, एक बार जाम लगा तो कई बार चार घंटे तक ट्रैफ़िक हिलता नहीं था.”

ज़ाहिर है कि सड़कों ने तीर्थयात्रियों की यात्रा को आसान कर दिया है और इसने पर्यटक के व्यावसाय में लगे लोगों को भी फ़ायदा पहुँचाया है.

मंदिर प्रबंधन समिति के सचिव दोरजी बताते हैं कि अब पटना से बोधगया के रास्ते को फ़ोर लेन करने का प्रस्ताव है.

वे कहते हैं कि जिस दिन ऐसा हो गया उस दिन बोधगया में सड़क के रास्ते पहुंचने वाले पर्यटकों की संख्या और बढ़ जाएगी.

लेकिन बोधगया के टैक्सी स्टैंड पर खड़े टैक्सी चालक और मालिक बहुत ख़ुश नहीं दिखते.

विजय कुमार, ताज, साव जैसे कई लोग हैं जो इस बात की शिकायत करते हैं कि उनको मिलने वाला काम घट गया है.

ताज कहते हैं, “रोड तो ठीक हो गई है लेकिन हमारा धंधा नहीं बढ़ रहा है, लोग कोलकाता और वाराणसी से टैक्सी और बसें लेकर आ रहे हैं लेकिन यहाँ से तो कम ही लोग टैक्सी ले रहे हैं.”

साव तीन टैक्सियों के मालिक हैं. वे शिकायत करते हैं कि धंधा इतना मंदा चल रहा है कि ड्राइवरों की तनख़्वाह नहीं निकल पा रही है.

हालांकि इसके लिए वे सड़कों को नहीं, टैक्सियों की बढ़ी हुई संख्या और प्रतिस्पर्धा को दोषी ठहराते हैं.

टैक्सी स्टैंड के सामने ही विज़न टूर्स एंड ट्रवल्स के प्रबंधक जमील अहमद कहते हैं कि टैक्सी वालों की शिकायत सिर्फ़ ऑफ़ सीज़न की शिकायत है.

वे कहते हैं, “अक्तूबर से फ़रवरी तक जब पर्यटकों और तीर्थयात्रियों के आने का समय होता है तो यहाँ टैक्सियाँ नहीं मिलतीं और पास पड़ोस की जगहों से टैक्सियाँ बुलानी पड़ती हैं.”

वाहनों की संख्या के बारे में वे कहते हैं, “काम है तो गाड़ियाँ बढ़ रही है. अभी पिछले कुछ सालों में यहाँ टाटा से लेकर हुंडै तक कई बड़ी कंपनियों के शो रुम भी खुल गए हैं.”

वे मानते हैं कि आने वाले दिनों में यह परिदृश्य और बदलेगा और ज़्यादातर लोग सड़क से ही यात्रा करना पसंद करेंगे क्योंकि यह रिज़र्वेशन से लेकर समय पर ट्रेन के पहुँचने का तनाव को कम करता है.

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