मुंबई में चलता है लग्ज़री ऑटो

वेदिका चौबे, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए मुंबई से
संदीप मुंबई का एक ऐसा ऑटो चालक है जिनके ऑटो में मुंबई का हर यात्री एक बार सफ़र करना ज़रूर चाहता है. इनकी ऑटो में जो एक बार सफ़र कर लेता है वो इन्हें कभी भूल नहीं पाता है.
संदीप एक सामान्य ऑटो चालक की तरह ही शहर में घूमते रहते हैं. शहर में इस ऑटो को लोग 'लग्ज़री ऑटो' के नाम से जानते हैं. क्या आप सोच सकते हैं कि एक ऑटोरिक्शा में आपको क्या-क्या सुविधाएं मिल सकती हैं? अगर नहीं तो संदीप के ऑटो में आपको एक बार ज़रूर सफ़र करना चाहिए.
इस ऑटोरिक्शा की ख़ासियत ये है कि इसमें सफ़र करने के साथ-साथ आपके मनोरंजन के लिए टेलीविज़न, एमपी-थ्री, एफ़एम रेडियो, ताज़ा ख़बर के लिए अख़बार, पत्र-पत्रिकाएं की सुविधाएं मौजूद हैं. इतना ही नहीं, इस ऑटो में आपके स्वाथ्य को ध्यान रखते हुए प्राथमिक उपचार के लिए ज़रूरी सामान और आग जैसी दुर्घटना से निपटने के लिए अग्निशामक उपकरण भी लगे हैं.
ये सफ़र आपके लिए उपयोगी सिद्ध हो इसके लिए इसमें व्यवसाय संबंधित नवीनतम जानकारी भी मिलती है. जैसे सोना-चांदी के भाव, विदेशी मुद्राओं की दर, होटल-सिनेमाघरों-मॉल्स आदि के फ़ोन नंबर्स, कैलैंडर आदि सब कुछ मौजूद है.
अगर आपको मीठा पसंद है तो आपके लिए चॉकलेट बॉक्स भी उपल्बध है. समाज सेवा में आपका कुछ योगदान हो इसके लिए डोनेशन बॉक्स भी मौजूद है. अगर आप इस डोनेशन बॉक्स में पैसे डालते हैं तो ये 'ओल्ड एज़ होम' और विकलांगों की सहायता के लिए जाता है. खुद को मुन्नाभाई एसएससी कहने वाले संदीप कहते है, "मुझे सिर्फ इस बात का दुःख है कि मेरे रिक्शे में 'टॉयलेट' नहीं है." आप सोच रहे होंगे कि इतनी सुविधाएओं के लिए ज़्यादा पैसे देने पड़ते होगें. लेकिन ऐसा नहीं है. इस ऑटो का भी किराया दूसरे ऑटो की तरह ही है. लेकिन संदीप ने इसमें भी अपने आपको दूसरे ऑटो चालक से अलग कर लिया है.
संदीप का कहना है, "मेरे ऑटो में बैठने वाली दृष्टिहीन सवारी को मैं 50 फ़ीसदी, विकलांग को 25 फ़ीसदी और 'जस्ट मैरिड' जोड़े को 10 फ़ीसदी की छूट देता हूं. इससे मुझे मन की शांति मिलती है और मुझे लगता है इससे दुआएं भी खूब मिलती हैं." संदीप ने अपने ऑटोरिक्शा के एक कोने में 'ड्रीम हॉउस' भी बना रखा है और ये बांद्रा इलाक़े में अपना ख़ुद का घर बनाना चाहते है.
संदीप का सपना
इस ड्रीम हॉउस के बारे में वो कहते हैं, "मेरा सपना है कि बांद्रा में मेरा भी घर हो. मैं फिलहाल बांद्रा में ही एक छोटे से घर में रहता हूँ. मुझे पूरी उम्मीद है कि मेरा और मेरे परिवार का ये सपना एक दिन ज़रूर पूरा होगा." संदीप जब अपना ऑटो लेकर चलते है तो सड़क के किनारे रुकते ही कई छोटे बच्चे चॉकलेट की लालच में उन्हें घेर लेते है.
यात्रियों से अपने संबंध के बारे में वो बताते हैं, "मेरे रिक्शे में हमेशा चॉकलेट रखा रहता है. अगर मुझे ग्राहक को दो रूपया वापस करना होता है तो मैं उन्हें दो रूपए नहीं देकर चॉकलेट देता हूँ. मेरे ग्राहक कभी मुझसे रूठ कर नहीं गए हैं. मैं उनसे किसी बात के लिए लड़ाई नहीं करता बल्कि उनके कहे अनुसार करता हूँ. ग्राहक को इज़्ज़त दूंगा तभी मैं कुछ कर पाऊँगा."
संदीप के रिक्शे की बहुत मांग है. लोग इनकी ऑटो की एडवांस बुकिंग करते हैं. सुबह नौ बजे घर से निकलते हैं और रात को क़रीब 10 बजे तक घर पहुंचते हैं. कुछ मौक़ों पर इनका ऑटो दिन भर भरा रहता है. जैसे वेलैंटाइन डे या कोई इसी तरह का पर्व-त्योहार. संदीप पहले कोई छोटी-मोटी नौकरी करते थे पर नौकरी छूट जाने के बाद ऑटो चालक बन गए. इनके दो बच्चे हैं. पत्नी भी नौकरी करती हैं. ग्राहक खुश होकर इनके डॉनेशन बॉक्स में पैसे भी डालते हैं और इनका मोबाइल नंबर भी माँगते हैं.












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