• search
क्विक अलर्ट के लिए
अभी सब्सक्राइव करें  
क्विक अलर्ट के लिए
नोटिफिकेशन ऑन करें  
For Daily Alerts

महिला सशक्तिकरण की ओर पहली छलांग

By Staff
|
महिला सशक्तिकरण की ओर पहली छलांग

ज़फ़र आग़ा

वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

दुनिया माने या न माने, लेकिन हम भारतीयों ने वास्तविक महिला सशक्तिकरण की ओर पहली छलांग लगा ली है.

महिला सशक्तिकरण का इससे बेहतर क्या उपाय होगा कि देश की संसद और राज्य विधानसभाओं में एक तिहाई महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित कर दी जाए.

यह काम एक महिला नेता सोनिया गाँधी के हाथों हुआ, यह भी अपने आपमें एक ऐतिहासिक क़दम है. कारण यह कि इस पुरूष प्रधान समाज में महिला आरक्षण के लिए एक महिला का साहस जुटाना कोई सरल बात नहीं है.

सोनिया गाँधी ने एक महिला होकर 'यादव' पुरूष नेताओं तक को ललकारा है. इसमें कोई शक नहीं है कि इतिहास सोनिया गाँधी को महिला सशक्तिकरण के लिए सदा याद करेगा.

लेकिन राज्य सभा में महिला आरक्षण बिल पारित होने के पश्चात भारतीय राजनीति में यह सिद्धांत तय हो गया कि दबे-कुचले वर्गों के सशक्तिकरण का एक मात्र उपाय आरक्षण ही है.

यही कारण है कि महात्मा गाँधी ने सबसे पहले 1930 के दशक में ही (जबकि आरक्षण पद्धति पर बहुत विरोध था) समाज के सबसे दबे कुचले दलित वर्गों के सशक्तिकरण के लिए दलित आरक्षण को स्वीकार कर लिया था.

इसी प्रकार दूसरी पिछड़ी जातियों के लिए विश्वनाथ प्रताप सिंह ने 1990 में सरकारी नौकरियों में आरक्षण निधारित कर दिया. अब सोनिया गाँधी ने महिला आरक्षण विधेयक के ज़रिए महिला सशक्तिकरण का बीड़ा उठाया है.

सारांश यह कि आरक्षण ही दबे- कुचले वर्गों के सशक्तिकरण का एकमात्र उपाय है.

कम से कम भारतीय राजनीति में तो आरक्षण को ही पिछड़ों के सशक्तिकरण का उपाय मान लिए गया है. दलित हों या पिछड़ी जातियां या महिला, हर पिछड़े वर्ग के लिए भारत के संविधान में आरक्षण का माध्यम चुना गया है.

यह सशक्तिकरण और सामाजिक न्याय का एक सफल माध्यम भी सिद्ध हुआ. क्योकि वह दलित हों या पिछड़े, हर आरक्षित वर्ग आरक्षरण के बाद सशक्त हुआ है. आज मायावाती आरक्षण की कृपा से ही एक ऐसे स्थान पर पहुंची जिसको वो कभी भी दलित आरक्षण के बिना नहीं प्राप्त कर सकती थीं.

यही बात बहुत हद तक लालू यादव और मुलाएम सिंह जैसे यादव बंधुओं पर भी सिद्ध होती है. अथार्त आरक्षण हर दबे- कुचले वर्ग के सफल सशक्तिकरण की एक सीढ़ी है.

जब आरक्षण को सशक्तिकरण का एक सफल माध्यम स्वीकार किया जा चुका है तो फिर देश के हर दबे कुचले वर्ग को आरक्षण क्यों नहीं दिया जा सकता है.

सच्चर समिति की रिपोर्ट ने मुसलमानों को हर दृष्टि से पिछड़ा और दबा कुचला स्वीकार कर लिया है.

मनमोहन सरकार ने सच्चर कमेटी की रिपोर्ट स्वीकार भी कर ली है. ऐसी स्थिती में अब मुस्लिम आरक्षण पर संकोच क्यों? अगर मुस्लिम आरक्षण की राह में कुछ संवैधानिक रोड़े हैं भी तो उनको महिला आरक्षण के समान संविधान संशोधन के जरिए हटाया जा सकता है.

महिला आरक्षण के बाद अब मुस्लिम आरक्षण मुद्दे को किसी भी तरह से बहुत समय तक टाला भी नहीं जा सकता है.

ऐसे में कहीं मोहम्मद अली जिन्ना की आत्मा को शांति तो नहीं पहुँच रही होगी, क्योंकि महिला विधेयक ने जिन्ना के मुस्लिम आरक्षण एजेंडे को इस देश में फिर से ज्वलंत कर दिया है.

वो माया हों या लालू या मुलायम, अब बहुत सारे जिन्ना की सुर में मुस्लिम कोटे का गुणगान करने लगे है.

देखिए यह महिला आरक्षण विधेयक और क्या- क्या गुल खिलाता है.

जीवनसंगी की तलाश है? भारत मैट्रिमोनी पर रजिस्टर करें - निःशुल्क रजिस्ट्रेशन!

देश-दुनिया की ताज़ा ख़बरों से अपडेट रहने के लिए Oneindia Hindi के फेसबुक पेज को लाइक करें
For Daily Alerts
तुरंत पाएं न्यूज अपडेट
Enable
x
Notification Settings X
Time Settings
Done
Clear Notification X
Do you want to clear all the notifications from your inbox?
Settings X
X
We use cookies to ensure that we give you the best experience on our website. This includes cookies from third party social media websites and ad networks. Such third party cookies may track your use on Oneindia sites for better rendering. Our partners use cookies to ensure we show you advertising that is relevant to you. If you continue without changing your settings, we'll assume that you are happy to receive all cookies on Oneindia website. However, you can change your cookie settings at any time. Learn more