उच्च और सर्वोच्च न्यायालय दे सकते हैं सीबीआई जांच के आदेश : शीर्ष अदालत (लीड-2)

यह महत्वपूर्ण फैसला प्रधान न्यायाधीश के. जी. बालाकृष्णन की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की खंडपीठ ने दिया।

इस खंडपीठ में न्यायमूर्ति डी.के. जैन, न्यायमूर्ति आर. वी. रवींद्रन, न्यायमूर्ति पी. साथशिवम और न्यायमूर्ति जे. एम. पंचाल शामिल थे। खंडपीठ ने कहा कि ऊपरी अदालतें केंद्र और राज्य सरकारों से बिना सहमति लिए सीबीआई जांच का आदेश दे सकती हैं।

खंडपीठ ने कहा, "संविधान की धारा 226 के तहत उच्च न्यायालय या धारा 32 के तहत सर्वोच्च न्यायालय अपने क्षेत्राधिकार का प्रयोग करते हुए राज्य से सलाह किए बिना राज्य की सीमा के भीतर के मामले में सीबीआई को निर्देश दे सकती और यह न तो संघीय ढांचे को प्रभावित करता है और न ही शक्ति के बंटवारे के प्रतिकूल है।"

खंडपीठ ने यह भी कहा कि आदेश देने से पहले अदालतों को इस पर संतुष्ट होना चाहिए कि यह आदेश कानून के शासन की गरिमा और मूलभूत अधिकारों की रक्षा के लिए दिया जा रहा है।

ऊपरी अदालतों की शक्ति के मुद्दे पर विभिन्न पक्षों की दलील सुनने के बाद खंडपीठ ने 11 दिसंबर को अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया था।

ऊपरी अदालतों द्वारा सीबीआई जांच के आदेश के अधिकार संबंधी मुद्दा 22 मार्च 2007 को पूर्व न्यायाधीश बी. एन. अग्रवाल की संविधान पीठ के पास आया था।

इस मामले में पश्चिम बंगाल सरकार ने कोलकाता उच्च न्यायालय द्वारा 7 अप्रैल 2001 को दिए गए आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें गबरेटा में तृणमूल कांग्रेस के 11 कार्यकर्ताओं की हत्या की सीबीआई जांच का आदेश दिया गया था।

पश्चिम बंगाल सरकार के वकील की दलील थी कि यदि अदालतें सीबीआई जांच का आदेश देती हैं, तो यह दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम 1946 का उल्लंघन है।

सरकारी वकील ने कहा कि इस अधिनियम की धारा 6 के अनुसार, राज्य में हुए किसी सं™ोय अपराध की जांच सीबीआई राज्य सरकार की सहमति के बिना नहीं कर सकती।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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