मिशन 2012: फैसला युवओं के हाथ में

2009 में आई वैश्विक आर्थिक मंदी में यदि सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं, तो वो हैं देश के युवा। खासतौर से वो जो दो पैसे कमाने के लिए खून पसीना एक करते हैं। खास बात यह है कि इन्हें ही अगली सरकार से सबसे ज्यादा आस भी है। क्योंकि घर गिरहस्थी चला रहे लोगों के लिए महंगाई सबसे बड़ा मुद्दा है, लेकिन वो केंद्र के हाथ में है। राज्य के विकास की बात करें तो यह फैक्टर भी युवाओं से अलग नहीं है, क्योंकि राज्य जितना ज्यादा विकसित होगा, उनके लिए रोजगार के अवसर उतने ज्यादा खुलेंगे।
आज और अभी से सोचना होगा
सेंसस द्वारा तैयार किए गए वर्ष 2001 के आंकड़ों के मुताबिक भारत की जनसंख्या का कुल 41.05 प्रतिशत युवा वर्ग है। यानी हर चुनाव में युवाओं के एक-एक वोट कीमती साबित हो सकते हैं। लेकिन क्या यह बात उत्तर प्रदेश विधानसभा में सत्ता जमाने का सपना बुन रहीं राजनीतिक पार्टियां समझ रही हैं? या फिर राजनीतिक दल 2012 में चुनावी बिगुल फूंके जाने का इंतजार कर रही हैं। उत्तर प्रदेश के राजनीतिक गलियारे में सभी गैर सत्ताधारी पार्टियां चाहे वो भारतीय जनता पार्टी हो या फिर समाजवादी पार्टी और या कांग्रेस। सभी के पास एक ही घिसा पिटा मुद्दा है। वो है मायावती और उनके हाथी की मूर्तियां और पार्क।
हर पार्टी उत्तर प्रदेश के पिछड़ने के पीछे एक ही तर्क दे रही है, कि बसपा सरकार ने जनता का धन विकास के बजाए मूर्तियां बनवाने में खर्च दिया। जो पार्टियां मायावती सरकार की कमियां निकालकर उन्हें चिन्हित कर रही हैं, उन्हें एक बार लोकसभा चुनाव 2009 में भारतीय जनता पार्टी की हार के पन्ने पलट कर जरूर देख लेने चाहिए। क्योंकि आज के समय में निगेटिव कैंपेनिंग से चुनाव नहीं जीता जा सकता है। चुनाव के लिए पार्टी की नीव खोखले नहीं बल्कि ठोस खंभों का आधार देते हुए मजबूत करने की जरूरत है। वो ठोस खंभे और कोई नहीं बल्कि प्रदेश के युवा हैं। यह बात तय है कि 2012 के घमासान में जीत उसी की होगी, जिसकी तरफ राज्य का युवा वर्ग होगा।
हो सकता है यहां तक पढ़ने के बाद आपको लगा हो कि चुनाव 2012 में हैं, और हम अभी से बात करने लगे, लेकिन यह बात इतनी महत्वपूर्ण है कि इसे आज और अभी करना जरूरी है। इसीलिए अराउंड दि इंडिया ने उत्तर प्रदेश की प्रमुख पार्टियों की युवा इकाईयों के अंदर झांक कर देखा। हर पार्टी से एक बात तो साफ निकल कर आई है कि इस बार सभी युवा नेताओं को ज्यादा से ज्यादा बढ़ावा देंगे और इसके लिए जरूरी है शहर-शहर, गांव-गांव और गली-गली के युवाओं को अपने साथ जोड़ना।
खास बात यह है कि हर पार्टी इस बार अपने यूथ आईकन को ही आगे लेकर चल रही है। कांग्रेस की बात करें तो युवक कांग्रेस के हर नेता की जुबान पर राहुल गांधी का नाम है। समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता जहां पहले हर बात नेताजी (मुलायम सिंह यादव) का नाम लेकर किया करते थे, आज अखिलेश भईया (अखिलेश सिंह यादव) का नाम लेकर करते हैं। वहीं भारतीय जनता पार्टी में कार्यकर्ताओं ने फिलहाल तो किसी यूथ आईकन का नाम आगे नहीं रखा है, लेकिन हां यह बात तय है कि अगले चुनाव में भाजपा के युवा सांसद वरुण गांधी का नाम अपने आप आगे आएगा।
कांग्रेस ने चुना शिक्षित वर्ग
उत्तर प्रदेश के पिछले दो विधानसभा चुनावों में अगर सबसे बड़ी हार हुई है तो वो है कांग्रेस की, जिसका असर उसे लोकसभा चुनावों में भी देखने को मिला। लेकिन इस बार कांग्रेस अपनी उन्हीं हारों को जीत में बदलने के अथक प्रयास कर रही है। कांग्रेस महासचिव व अमेठी से सांसद राहुल गांधी ने लोकसभा चुनावों के तुरंत बाद से ही उत्तर प्रदेश की ओर रुख कर लिया है। सबसे खास बात यह है कि चाहे शहरों में वार्ड हों या फिर गांवों में ब्लॉक और ग्राम पंचायत। हर स्तर पर कांग्रेस ज्यादा पढ़े लिखे युवाओं को मौका दे रही है।
युवक कांग्रेस से युवा कांग्रेस में बदल चुकी इस पार्टी ने उत्तर प्रदेश में 18 लाख से ज्यादा सदस्य बना लिए हैं। युवक कांग्रेस ने अपने सदस्यता अभियान को चार जोन में बांटा है- पश्चिम, मध्य, पूर्वांचल व बुंदेलखंड। इनमें प्रत्येक में सदस्यों की संख्या 6 लाख से ऊपर निकल चुकी है। खास बात यह है कि ग्राम व ब्लॉक स्तर से लेकर प्रदेश स्तर तक पदाधिकारियों का चुनाव युवा कांग्रेस के सदस्य ही करेंगे। इसी साल पार्टी में पदाधिकारी मनोनीत करने की प्रथा समाप्त कर दी गई। यानी पार्टी के अंदर भी लोकतंत्र की भावना बनी रहेगी। खास बात यह है कि ग्राम पंचायत स्तर पर भी यदि कोई चुनाव लड़ता है तो उसे कम सेकम हाई सकूल पास होना जरूरी है। इससे यह साफ हो गया है कि राहुल गांधी का टार्गेट पढ़े-लिखे नौजवानों के वोट हैं।
युवा कांग्रेस के प्रवक्ता तरुणेंद्र चंद्र पटेल 'तरुण' का कहना है कि कांग्रेस की इस यूथ विंग में सोशल इंजीनियरिंग को खास तरजीह दी जा रही है। यानी हर वर्ग के लोगों को पदाधिकारी चुना जाएगा। यही नहीं महिलाओं को भी आरक्षण दिया जा रहा है। तरुण के मुताबिक शहरों में एक वार्ड में यदि अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और 8 महासचिव चुने जाते हैं, तो उनमें 3 आरक्षित वर्ग के होंगे। यही नहीं यदि महिला के लिए आरक्षित सीट पर चुनाव नहीं हुआ तो वो तबतक खाली रहेगी, जबतक कोई महिला उसपर काबिज न हो जाए। तरुण ने कहा कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का लक्ष्य युवा शक्ति के बल पर विधानसभा चुनावों में जीत दर्ज करने का है।
पुरानी उपलब्धियों से अभी तक खुश
हाल ही में फिरोजाबाद के उपचुनावों में समाजवादी पार्टी की प्रत्याशी व अखिलेश सिंह यादव की पत्नी डिंपल यादव की हार ने सपा के कान खड़े कर दिए हैं। खास बात यह है कि इस हार ने सपा की युवा शक्ति को भी कमजोर साबित कर दिया, जिसके दम पर पार्टी के हर बड़े नेता फूलते रहे हैं। अपने कार्यकाल के दौरान समाजवादी पार्टी ने कन्या विद्या धन और बेरोजगारी भत्ता देकर व सरकारी भर्तियां करवाकर और छात्रसंघों की बहाली करवाकर युवा शक्ति को जिस मजबूती के साथ अपनी ओर खींचा था, वो अब बरकरार नहीं दिख रही है। पार्टी कार्यालय में झांक कर देखें तो सपा के यूथ आईकन अखिलेश यादव पार्टी के प्रत्येक युवा पदाधिकारियों से खासा जुड़ाव रखते हैं, लेकिन कार्यकर्ताओं के वो कितने करीब हैं यह स्पष्ट नहीं है। यह बात तय है कि अखिलेश यादव की छवि और सपा की युवा शक्ति ही विधानसभा चुनावों में पार्टी की सीटें तय करेगी। खास बात यह है कि सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव भी कांग्रेस की यूथ इंजीनियरिंग को पढ़ चुके हैं। यही कारण है कि उन्होंने पार्टी के पिछले सम्मेलन में घोषणा की कि 2012 में होने वाले विधान सभा चुनाव में वो 40 प्रतिशत युवा प्रत्याशी मैदान में उतारेंगे।
नेताजी ने तो घोषणा कर दी, लेकिन ज़मीनी स्तर पर क्या हो रहा है यह हमने जानने के प्रयास किए समाजवादी युवजन सभा के राष्ट्रीय महासचिव राजपाल कश्यप से। विधानसभा चुनाव की बात आते ही राजपाल भी कन्या विद्याधन, बेरोजगारी भत्ता, छात्रसंघ, ... जैसी उपलब्धियां गिनाने लगे। हमने जब उनसे पूछा कि सपा की युवा इकाई को मजबूत करने के लिए वो क्या कर रहे हैं, तो जवाब मिला कि हम बेरोजगार युवाओं और छात्रों और की मदद कर रहे हैं, जिसके माध्यम से वे अपने-आप हमसे जुड़ते जा रहे हैं। युवा कांग्रेस के सदस्यता अभियान पर उनका कहना है कि कांग्रेस प्रदेश के युवाओं को बरगला रही है। चुनाव निकल जाने के बाद युवा कांग्रेस का अस्तित्व फिर समाप्त हो जाएगा। वहीं अगर भारतीय जनता पार्टी के युवा संगठन भाजयुमो और छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की बात करें तो दोनों का अस्तित्व खतरे में नजर आ रहा है। हालांकि पार्टी के नए अध्यक्ष नितिन गडकरी के नेतृत्व में एक बार फिर आस जगी है, लेकिन फिलहाल मिशन 2012 को लेकर पार्टी के नेता स्पष्ट जवाब नहीं दे पा रहे हैं। विद्यार्थी परिषद की बात करें तो एक समय था जब महाविद्यालयों में यह संगठन बुद्धिजीवियों को आगे लेकर चलती थी, लेकिन फिलहाल उसकी भी हालत खस्ताहाल है।












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